गायत्री जयंती 12 जून को / हर युवा के लिए उपयोगी है गायत्री मंत्र, सिर्फ धार्मिक नहीं विज्ञान और मनोविज्ञान दोनों नजरिए से है बहुत प्रभावशाली

मनुष्य का जीवन जैसे-जैसे बढ़ता है, समस्याएं, कठिनाइयों का उन्हें सामना करना पड़ता है। कुछ समय तक अभिभावक उनकी विपदाओं को दूर करते हैं। लेकिन, जैसे ही युवा होता है, उस समय अभिभावक उसे अपनी समस्याओं का समाधान उन्हें स्वयं ढूंढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। युवाओं में यदि सकारात्मक सोच हो, तो वह वायु का रुख भी बदल लेता है। लेकिन, जब वह अपरिपक्व हो, तो स्वयं हवा के झोंके में बह जाता है। ऐसे समय में उन्हें अपने भीतर झांकने की आवश्यकता पड़ती है।
भारतीय संंस्कृति एवं हिन्दू शास्त्र में एक ऐसा मंत्र है, जिससे बच्चे, युवा से लेकर बुजुर्ग तक अपने कष्ट से निजात पा सकते हैं। कष्ट चाहे शारीरिक हो या मानसिक। पारिवारिक समस्याओं से भी मुक्ति का मार्ग दिखाने में सक्षम है। यह मंत्र भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में उल्लेखित है। इसके साथ ही कई आर्षग्रंथों में भी इसका वर्णन मिलता है। इस महामंत्र का जप मनुष्य मात्र को उत्थान, प्रगति की ओर ले जाता है। पिछले कुछ वर्षों में इस पर तर्क, तथ्य एवं प्रणाम के साथ हुए शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि इस मंत्र में अपार शक्ति है।
हम बात कर रहे हैं- गायत्री महामंत्र की। कहा जाता है कि वेदमाता गायत्री की उत्पत्ति ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि (इस वर्ष 12 जून) को हुई थी। आज से प्रारंभ की जानी वाली गायत्री साधना फलीभूत होती है।
गायत्री मंत्र को देव मंत्र भी कहा जाता है। इस मंत्र का अर्थ है- उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुख-स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देव-स्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
आज के युवा जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर निर्भर होते जा रहा है, इससे उनमें आत्मविश्वास या यूं कहें कि उनका व्यक्तित्व उनके गैजेट पर आधारित हो गया है। युवाओं को अपने अंदर झांकने का समय भी निकालना  लेना चाहिए। जिससे आत्मविश्वास या आत्मिक शक्ति का विकास हो सके। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट का उपयोग करने के लिए मनाही नहीं है। लेकिन, उसका उपयोग एक तय सीमा तक करें, तो उत्तम होगा।
युवाओं को संकीर्णता से ऊपर उठकर आगे की कुछ सोचना चाहिए और गायत्री मंत्र एक ऐसा मंत्र है जिसके जप से बुद्धि में तेजस्विता आती है, परमात्मा की कृपा बरसती है और वह परमात्मा जप करने वाले की बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करती है। यदि जीवन में स्थिरता आ गई हो, तो इस मंत्र के जप, ध्यान से जीवन में खुशहाली लाई जा सकती है।
त्रिपदा गायत्री की तीन धाराएं इन तीनों चीजों से उबरने की शिक्षा देती हैं। मनुष्य को औरों के लिए, जीवन में उत्कृष्टता संवर्धन हेतु प्रभु समर्पित जीवन जीना चाहिए।
गायत्री महामंत्र का दूसरा शिक्षण यह है कि मनुष्य के पास शरीर और मन की जो शक्तियां हैं, उन्हें वासना के द्वारा नष्ट नहीं करना चाहिए। अपने आपको समेटना चाहिए, बिखरेना नहीं। इन्द्रियों की सामर्थ्य व शक्तियों का अपव्यय नहीं, सद्व्यय करना चाहिए। अगर ऐसा हो सके, तो हमारी जीवन-ऊर्जा का क्षरण रुकेगा, वह संचित-संरक्षित होगा तथा सदुद्देश्य के लिए उसका उपयोग होगा।
तीसरा शिक्षण यह है कि हम अपने लोभ-लालच को, अपनी कामना-तृष्णा को निगृहीत कर सकें, तो हममें से प्रत्येक व्यक्ति देवमानव की श्रेणी में पहुंच सकता है। तीन धाराओं के रूप में त्रिपदा गायत्री, गायत्री जयंती के दिन इसीलिए अवतरित हुई थीं कि मनुष्य यश-सम्मान के पीछे न भागे, कर्त्तव्य का अनुसरण करे, संसार चाहे कितना भी विरोध करे, किन्तु  वह सदाचरण का परित्याग न करे।
आज के दिन हम और आप सबको फिर से आत्म मंथन में डूबना चाहिए। हजार बार सोचना चाहिए कि हमारी भगवत् प्रदत्त सामर्थ्य व शक्तियों का सदुपयोग व सुनियोजन हो रहा है या नहीं? गायत्री जयंती इस संकल्प को क्रियान्वित करने का  महापर्व है और इसे पूर्ण करना हमारा परम कर्त्तव्य है।
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