🌿🌸आध्यात्म सत्संग🌸🌿

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दान से संबंधित नियम

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1 मनुष्य को अपने द्वारा न्यायपूर्वक अर्जित किए हुए धन का दसवाँ भाग ईश्वर की प्रसन्नता के लिए किसी सत् कर्मो में लगाना चाहिए ।
जो मनुष्य अपने स्त्री, पुत्र एवं परिवार को दुःखी करके दान देता है । वह दान जीवित रहते हुए भी एवं मरने के बाद भी दुःखदायी होता है ।

2 स्वयं जाकर दिया हुआ दान उत्तम एवं घर बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम फलदायी होता है । गौओं, ब्राह्ममणों तथा रोगीयों को जब कुछ दिया जाता हो उस समय जो ना देने की सलाह देता हो वह दुःख भोगता है ।

3 तिल, कुश, जल और चावल इनको हाथ में लेकर दान देना चाहिए अन्यथा उस दान पर दैत्य अधिकार कर लेते है । पितृो को तिल के साथ तथा देवताओं को चावल के साथ दान देना चाहिए । परन्तु जल व कुश का संबंध सर्वत्र रखना चाहिए ।

4 देने वाला पूर्वाभिमुखी होकर दान दे, और लेने वाला उत्तराभिमुखी होकर उसे ग्रहण करे, ऐसा करने से दान देने वाले की आयु बढती है और लेने वाले की भी आयु क्षीण नही होती ।

5 अन्न, जल, घोडा, गाय, वस्त्र, शय्या, छत्र और आसन इन आठ वस्तुओं का दान मृत्युउपरांत के कष्टों को नष्ट करता है ।

6 गाय, घर, वस्त्र, शय्या तथा कन्या इनका दान एक ही व्यक्ति को करना चाहिए । रोगी की सेवा करना, देवताओं का पूजन, ब्राह्ममणों के पैर धोना गौदान के समान है ।

7 दीन, अंधे, निर्धन, अनाथ, गूँगे, जड़, विकलांगो तथा रोगी मनुष्य की सेवा के लिए जो धन दिया जाता है उसका महान पुण्य होता है ।

8 विद्याहीन ब्राह्ममणों को दान नही लेना चाहिए लेने से ब्राह्ममण की हानि होती है ।

9 गाय, स्वर्ण, चाँदी, रत्न, विद्या, तिल, कन्या, हाथी, घोडा, शय्या, वस्त्र, भूमि, अन्न, दुध, छत्र तथा आवश्यक सामग्री सहित घर इन 16 वस्तुओं के दान को महादान कहते है ।

ज्योतिषाचार्य

डॉ. प्रणयन एम. पाठक

उज्जैन

9202220000

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