जैसा कि अमूमन हर संपादक रोज़ की दौड़ती भागती दुनिया भर की खबरों को देखता है, विचारशील होता है और अपना उद्गार व्यक्त करने के लिए समय समय पर कुलबुलाता है। कालांतर में रस्म-ए-संपादकीय, उतपन्न हुआ।

इसी तारतम्य में पुनः पसतुत हू। नमस्कार, आदाब और हेलो के साथ आज ईद के मौके की मीठी मुबारकबाद भी संलग्न है।

ईद का दिन है गले आज तो मिल ले जालिम,
रस्म-ऐ-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है।

त्योहार की खुशियों के बीच संपादक नामा आगे व्यक्त करता हूँ, 

'बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान। करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।'

वन से भाग कर बहेलिये के द्वारा खोये हुए गड्ढे में गिरा हुआ हाथी अपनी व्यथा किस से कहे ?

सारांश यह कि पत्रकारिता की जिज्ञासा सें प्रेरित हो कर हम संपादक प्रजाति अपना घर छोड़ कर बाहर तो निकल आये और दुनिया के कोलाहल के गड्ढे में गिर कर अकेले निर्वासित हो कर असंवाद्य स्थिति में पड़ चुके हैं।

आंखों के आगे कलयुग नाच रहा हो और ह्रदय के भीतर धर्म स्थापित हो तो दिमाग चकरा जाता है। खभी इक्छा होती है कि ऐंग्री यंग मैन वाला विद्रोह कर दूं। खभी लगता है कि अपना काम ईमानदारी से करूँ यही समाज मे मेरा योगदान होगा। कभी लगता है कि एक आवेदन की पाती श्री राम को भी लिख कर शिकायत करूँ की मोह माया की रचना करके सत्य बन ह्रदय में क्यों विराजते हो ?
उलझन बनी रही। किसके राम को पुकारूँ अयोध्या के राजा राम को? शबरी के राम को? माता सीता के राम को? या कबीर के राम को?
क्या मैं पुकारूंगा तो राम आएंगे ?

कबीर के राम

कबीर के राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं।  राम के साथ उनका प्रेम उनकी अलौकिक और महिमाशाली सत्ता को एक क्षण भी भुलाए बगैर सहज प्रेमपरक मानवीय संबंधों के धरातल पर प्रतिष्ठित है।

इस राम का आना पोथियों के पढ़ने से नहीं हो सकता, ढाई आखर प्रेम के आचरण से ही हो सकता है। धर्म ओढ़ने की चीज नहीं है, जीवन में आचरण करने की सतत सत्‍य साधना है। श्री राम की साधना प्रेम से आरम्‍भ होती है। इतना गहरा प्रेम करो कि पूरी प्रकृति तुम्‍हारे लिए परमात्‍मा हो जाए। उसको पाने की इतनी उत्‍कण्‍ठा हो जाए कि सबसे वैराग्‍य हो जाए, विरह भाव हो जाए तभी उस ध्‍यान समाधि में श्री राम जाग्रत हो सकते है। तब हम पूरे संसार से प्रेम करेंगे, तब संसार का प्रत्‍येक जीव हमारे प्रेम का पात्र बन जाएगा। सारा अहंकार, सारा द्वेष दूर हो जाएगा। फिर महाभाव जगेगा। इसी महाभाव से पूरा संसार श्री राम का घर हो जाता है।

अपनी इस भक्ति की शक्ति पर उनको इतना विश्वास था कि कबीर की दृढ़ मान्यता थी कि कर्मों के अनुसार ही गति मिलती है स्थान विशेष के कारण नहीं। अपनी इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए अंत समय में वह मगहर चले गए ;क्योंकि लोगों मान्यता थी कि काशी में मरने पर स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है।मगहर में उन्होंने अंतिम साँस ली। आज भी वहां स्थित मजार व समाधी स्थित है।

अभी मैं आपसे विदा लेता हूं।

कलेजे में हजारों दाग ,दिल में हसरतें लाखों,
कमाई ले चला हूँ साथ अपने जिंदगी भर की।

फिर मिलेंगे

नामा - लेख
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