सोनू त्रिपाठी रिपोर्टर कलयुग की कलम - नरसिंहपुर के बीच शहर का इलाका तमाम परिवारों की तरह वह परिवार भी गहरी नींद में था। पांच साल की बच्ची मां के बगल में सो रही थी।नींद खुली तो मासूम नही थी कुछ दूर मिली तो बेहोशी की हालत में उसके साथ किसी हैवान ने हैवानियत की थी। बात यहां सिर्फ नरसिंहपुर की नहीं है। पूरे प्रदेश मे मासूमों के साथ बलात्कार की घटनाएं इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि माता-पिता अपनी बच्चियों का चेहरा देखकर सिहर उठते हैं। शर्मसार करने वाली खबरें लगातार आ रही हैं। यहां सवाल फिर वही, आखिर समाज मे ऐसे हैवानों के चेहरे बदल जाते है ? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इसका क्या उपाय किया जा सकता है। कानून का डर जरूरी है या समाज में जागरूकता लाना? एक बात तय है कि अपराधियों के मन में कानून का खौफ होना चाहिए, लेकिन प्रदेश में वारदात के पहले और बाद में पुलिस का रवैया हमेशा आम लोगों में गुस्सा पैदा करने वाला होता है। पुलिस वारदात के पहले बेपरवाह रहती हैं।वारदात के बाद वर्दी का रौब दिखाती हैं। शर्मिंदगी की बात है पीडित पक्ष ज्यादातर मामलों में पुलिस की प्रताड़ना झेलना है। नरसिंहपुर में भी बच्ची के परिजन थाने पहुंचे तो वहां के इंचार्ज ने गाली गलौज करके भगा दिया। ऐसे में बलात्कारी से कम अपराधी तो वह इंस्पेक्टर भी नहीं माना जाएगा लेकिन उसे पता है कि वह वर्दीधारी है। आज सस्पेंड हो गया है, तो कल बहाल हो जाएगा। उधर बच्ची से हैवानियत करने वाला बैखौफ घूम रहा होगा। उसे पता है कि पुलिस ज्यादा से ज्यादा क्या करेगी? मामला ही मुश्किल से दर्ज हुआ तो कार्रवाई का अंदाजा कोई भी लगा सकता है। पुलिस शिकायत को गंभीरता से लेती और समय पर हरकत में आ जाती तो संभव था। आला अधिकारियों को चहिए कि वे निचले अमले को और अधिक संवेदनशील बनाएं। यह जरुरी है कि पुलिस पीडित पक्ष के दर्द को समझे। अपराधी को कानून की ताकत बताई जाऐं ।

सोनू त्रिपाठी रिपोर्टर कलयुग की कलम
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