हमारे संविधान का अनुच्छेद १५(१), लिंग के आधार पर भेदभाव करना प्रतिबन्धित करता है पर अनुच्छेद १५ (२) महिलाओं और बच्चों के लिये अलग नियम बनाने की अनुमति देता है। यहीं कारण है कि महिलाओं और बच्चों को हमेशा वरीयता दी जा सकती है।

अंर्तरार्ष्टीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज Convention of Elimination of Discrimination Against Women (CEDAW) (सीडॉ) है। सन १९७९ में, संयुक्त राष्ट्र ने इसकी पुष्टि की। हमने भी इसके अनुच्छेद ५(क), १६(१), १६(२), और २९ को छोड़, बाकी सारे अनुच्छेद को स्वीकार कर लिया है। 

केवल कानून के बारे में बात कर लेने से महिला सशक्तिकरण नहीं हो सकता है। इसके लिये समाजिक सोच में परिवर्तन होना पड़ेगा। फिर भी, यदि हम लैंगिक न्याय के बारे में सोचते हैं, इसके बारे में सपने देखते हैं – तब, आज नहीं तो कल, हम उसे अवश्य प्राप्त कर सकेंगे।
प्राचीन काल से लेकर आज के 'ग्लोबल विलेज ' काल तक  पितृसत्तात्मक  व्यवस्था ही स्त्री का सामाजिक कद निर्धारित करती आई है . इसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री को दो श्रेणियों में विभाजित किया है -

प्रथम - देवी स्वरूपा स्त्री ,जो पुरुष द्वारा निर्धारित नैतिक मापदंडों पर खरी उतरती है , पुरुष की आज्ञा का शीश झुकाकर पालन करती है , पतिव्रता , सती -साध्वी स्त्री ।

द्वित्य -इस श्रेणी में उन स्त्रियों को रखा गया जो पुरुष द्वारा निर्धारित आचरण की सीमाओं को लांघती हैं और इसी कारण उन्हें कुलटा , पुनश्छली , कर्कशा , वेश्या , बदचलन ,व्याभिचारिणी आदि अभद्र संज्ञाओं से विभूषित किया जाता है ।

                                       'त्रिया चरित्रं देवो न जानाति कुतो मनुष्य '' जैसी कुटिल उक्तियों से स्त्री-जाति की गरिमा की धज्जियाँ उड़ाते हुए पुरुष -वर्ग ने अपने पशु -बल का प्रयोग कर स्त्री की ज्ञानेन्द्रियों पर बलात ताला ठोक दिया और स्त्री को देह की कोठरी तक सीमित कर , उस देह पर भी अपना एकाधिकार घोषित कर दिया ।

“मार खाकर चुप रहूं मैं और हंसती भी रहूं
जुल्म की यह इंतहा है और तुमसे क्या कहूं
रूह तक घायल है मेरी जिस्म की तो छोड़िये
सोच कर तुम ही बताओ और मैं कितना सहूं
और मैं कितना सहूं, और मैं कितना सहूं।”

आज मेरे लेख का विषय है ‘महिलाओं पर बढ़ते अपराध, घटती नैतिकता व कानूनी विफलता’।
अबला जीवन हाय, तुम्हारी यही कहानी
आंचल में है दूध, और आंखों में पानी।
वर्षों बाद भी छायावाद काव्य की उपरोक्त पंक्तियां एकदम सटीक और दिल को छू जाने वाली हैं। परन्तु नारी जीवन की यह कहानी अब नहीं सुहाती।
महिलाओं का सतत शोषण इतिहास का एक कटु सत्य है। दुर्भाग्यवश भारत में सीता का अपहरण, द्रौपदी का वस्त्रहरण और निर्भया का निर्जातन हुआ। जो महिलाएं शिक्षित नहीं हैं उनकी दशा हमारे देश में और भी खराब है। परन्तु यह विडंबना है कि नारों के सैलाब में नारी की चित्कार विलीन होती जा रही है।
किसी शायर ने कहा हैः
“वतन की जो हालत सुनाने लगेंगे, फरिश्ते भी आंसू बहाने लगेंगे,
अगर भीड़ में खो गई आदमियत, उसे ढूंढने में जमाने लगेंगे।”
महिलाओं पर दृष्टिपात करने पर एक बडा. असंतुलित चित्र सामने आता है। एक जो हमें गौरवान्वित करता है, भारत की प्रतिष्ठा दुनिया में बढ़ाता है। लेकिन एक दूसरा चित्र भी है जहां महिला न जन्म से पहले सुरक्षित है और न बाद में सुरक्षित है। वह माता के गर्भ में मार दी जाती है और भ्रूण हत्या करने के लिए कोई बाहर से नहीं आता है, यह कार्य माता–पिता करते हैं, दादा–दादी करवाते हैं। जन्म के बाद तो न दो वर्ष की बच्ची सुरक्षित है, न 60 वर्ष की वृद्धा सुरक्षित है। दिल और दिमाग कौंधने लगता है जब अखबार में पढ़ने को मिलता है कि दो वर्ष की बच्ची बलात्कार की शिकार हुई, 60 वर्ष की बूढी औरत के साथ गैंगरेप हुआ। हमारा सिर शर्म से झुक जाता है और दिल दर्द से भर जाता है।
गुरूनानक देव जी ने अपनी वाणी में लिखा हैः
“एति मार पई कुर्लाने तै कि दर्द न आया।”
औरत कुरला रही है और राजाओं को दर्द नहीं हो रहा है, उनको दया नहीं आ रही है।
स्त्रियों पर जितने भी अत्याचार होते हैं, जो उत्पीड़न और शोषण होता है, उसके लिए केवल पुुरूषों को उत्तरदायी बनाना एक बहुत बड़ी भूल है। इस देश में हम सीता को मां के रूप में मानते हैं, सावित्री का नाम उदाहरण के रूप में देते हैं लेकिन जिस त्रेता युग में सीता पैदा हुई उसी युग में ताड़का ने भी जन्म लिया। इसलिए केवल नारी, नारी और नारी का हौवा खड़ा करके समाज में विषाक्त वातावरण खड़ा करने की जरूरत नहीं है। नारी पर जो जुल्म और अत्याचार होते हैं, उसमें महिलाएं भी शामिल होती हैं।
“तेरे पांव में कांटा लगे, मुझे दर्द का एहसास हो,
तेरी मुस्कुराहट छीन ले तो दिल मेरा उदास हो।”
यह विषय हमारी मां, बहनों और बेटियों से संबंधित है। बेटी हमारी शान है, मां हमारी जान है, उसकी इज्जत, एहतराम हर घर में जरूरी है, हर मजहब उसको इज्जत देता है।
किसी शायर ने बड़ी अच्छी बात कहीः

“कि बदनज़र पड़ने ही वाली थी किसी पर,
लेकिन अपनी बेटी का ख्याल आया तो दिल कांप गया।”

बलात्कार की घटनाएं अतीत में भी होती रही हैं, लेकिन इस समय स्थिति और भी भयावह हो गई है। दोषी को ढूंढने की जरूरत है। इसमें जो लोग अनाचार, अत्याचार और व्यभिचार में शामिल है, उनको कैसे कठोर से कठोर दंड दे सकें और कैसे कठोर कार्यवाही कर सकें, यह सोचने की आवश्यकता है। परन्तु साथ ही यह भी ध्यान देना होगा कि कानून का दुरूपयोग न हो।
महिलाओं के लिए पितृसत्तात्मक चौकसी की जरूरत नहीं है। सबसे महत्त्वपूर्ण है महिलाओं द्वारा उत्पीडन के खिलाफ आवाज बुलंद करना। बहादुर निर्भया युवती को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए कहा गया हैः
“तू चुप है, लेकिन गुजरेगी सदा ये अहसास तेरी,
दुनिया की अंधेरी रातों में ढांढस देगी आवाज तेरी।”
कानूनी व्यवस्था के नियमों के साथ आत्मचिंतन और आत्ममंथन करने की जरूरत है। बचपन में सैक्स की सही शिक्षा और सही उम्र में जीवन साथी का साथ होना चाहिए। स्त्रियों को बदलते परिवेश में उपभोक्तावादी संस्कृति का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में लज्जा को नारी का श्रृंगार माना गया है। परन्तु जिस देश की संस्कृति में नारी एक प्रतीक रही हो वहां मीडिया, विज्ञापनों, फिल्मों के द्वारा उसकी देह को निर्वस्त्र करने के प्रयास हो रहे हैं। पश्चिम सभ्यता की उड़ान में कुछ महिलाओं को यह भी याद नहीं रहता कि उनके शरीर की बनावट के अनुसार कौन से कपड़ों में वो सभ्य और शालीन दिख रही हैं। परन्तु बलात्कार की वजह वस्त्र अभाव नहीं बल्कि विवेक और संयम का अभाव है। प्रश्न मात्र कपड़ों का नहीं है, प्रश्न दृष्टिकोण का है। जो नारी को केवल उपभोग और काम तृप्ति की भावना से देखते हैं।
एक स्त्री क्या चाहती हैः
“नहीं चाहती वह नरम कालीन,
लेकिन कांटे तो मत बिछाओ।
बनाएगी वह रास्ता खुद अपना,
लेकिन बीच रास्ते में न छेड़ो, न सताओ।”
सरकार व संसद को कानूनों में आवश्यक फेर बदल करना होगा ताकि महिलाओं पर अन्याय रूके। महिलाओं की सुरक्षा एवं सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की तर्ज पर ताकत, संरक्षण और स्वायत्तता देने की बहुत जरूरत है। हम सब जानते हैं कि हमारे यहां इन्वैस्टीगेशन जल्दी नहीं होते जिस कारण दोषी लोगों को सजा नहीं मिल पाती। इस ओर सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है। पुलिस द्वारा भी महिलाओं पर बहुत अन्याय होते हैं। इसलिए पुलिस विभाग में महिलाओं की भर्ती ज्यादा से ज्यादा होनी चाहिए।
नवरात्री पूरी तरह से दुर्गा माता पर केंद्रित है जिन्हें महिलाओं की ताक़त के रुप में बताया जाता है. हमारे लिये यह जरुरी है कि हम इस त्यौहार के दौरान अपने बच्चों को इसके ज़रिये महिलाओं का आदर करना सिखायें. हम बतायें कि महिलाओं की ताक़त क्या होती है और किस तरह से एक मां अपने बच्चों के लिये त्याग करती है. इसलिये यह जरुरी हो जाता है कि हम महिलाओं को सम्मान दे और सड़क पर दिखने वाली हर महिला को आदर से देंखे.


स्त्री पर किये जाने वाले तेजाबी हमलों पर प्रश्न उठे। दहेज पर। छेड़छाड़ पर। परिवार नियोजन की शल्यक्रिया के लिए पुरुष भी आगे आवें, क्योकि यह आसान होती है।
सामयिक महिला सम्बन्धी घटनाओं व् बदलते सामाजिक मूल्यों पर प्रखर अभिव्यक्ति पत्रकारिता की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता बनाई जा सकती है। 

देश मे  दुर्गा शक्ति रैपिड एक्शन फोर्स बनाई गई है। 
आॅपरेशन दुर्गा अभियान के तहत महिला एवं बाल अपराधों के रोकथाम के लिए प्रयास किए गए हैं। छेड़छाड़ रोकने के लिए छात्राओं को दुर्गा शक्ति एप भी विकसित किया गया है।
महिलाओं के प्रति अपराध के लिए कई कानून और सजा के प्रावधान बने। 
लेकिन 2 महीने की बच्चियों और 70 साल की बुजुर्ग महिलाओं के साथ अपराध हो तो क्या किया जाए ? 

बलात्कार के ऊपर कई मंत्रियों एवम प्रबुद्धजनों ने अजीब सी बातें कहीं।। इनको यही मशविरा है कि बलात्कार क्या है?, ये तुम अपनी माँ से पूछना।।


अंत में देश की महिलाओं को सलाम करते हुए कहना चाहता हूं किः
“हर चिंगारी एक दिन अंगार बनती है,
हर टहनी एक दिन पतवार बनती है,
जो रौंदी गयी मिटटी समझकर,
जो रौंदी गयी बेबस मिटटी समझकर,
वही एक दिन मीनार बनती है।”


या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 

नमस्कार दोस्तों
Share To:

Post A Comment: