संत कबीर जयंती : संत कबीर के दोहे देते हैं जीवन को बदलने का संदेश…

ब्यूरो कोरिया चन्द्रमणि वर्मा 

KKK न्यूज़ रायपुर। जिस समय देश में धार्मिक कर्मकांड और पाखंड का बोलबाला था ऐसे समय में एक क्रांतिकारी संत, समाज सुधारक ने हिंदू और मुस्लिम दोनों के पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई लोगों में भक्ति भाव का बीज बोया. यह संत थे कबीर. ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को संत कबीर, कबीरदास या कहें कबीर साहब की जयंती के रुप में मनाया जाता है. अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार 2019 में कबीर जयंती 17 जून को है.

संत कबीर के समय में समाज ऐसे चौराहे पर खड़ा था, जहां चारों ओर धार्मिक पाखंड, जात-पात, छुआछूत, अंधश्रद्धा से भरे कर्मकांड, मौलवी, मुल्ला तथा पंडित-पुरोहितों का ढोंग और सांप्रदायिक उन्माद चरम पर था. आम जनता धर्म के नाम पर भ्रमित थी.

वैसे संत कबीर के जीवन वृत्तांत को लेकर लोगों के अलग अलग मत हैं.  परंतु,  साक्ष्यों के आधार पर कबीर साहेब का जन्म विक्रम संवत 1455 तथा मृत्यु विक्रम संवत 1575 माना जाता है.

संत कबीर के दोहों में जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की बात जगह–जगह पर की गई है. कबीर ने मानवता का संदेश देते हुए भक्ति की अलख को देश के विभिन्न हिस्सों में घूमकर जगाया है इसलिये आज भी लोग उनके पद गुनगुनाते हुए मिलेंगें

कबीर ने हमेशा बाह्य आडंबरों का विरोध करते हुए ईश्वर को समझने की शिक्षा दी उन्होंने कहा भगवान को खोजने के लिए हमें दर दर भटकने की जरूरत नहीं हैं बल्कि ईश्वर हमारे पास ही है.

कबीर के ऐसे दोहे जो आपके जीवन में कुछ अच्छा करने का भाव जगाएंगे…

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

 अर्थ-संत कबीर कहते हैं इस संसार में भले ही लोग कितनी बड़ी-बड़ी पुस्तकें क्यों न पढ़ लें, लेकिन वो तब तक विद्वान नहीं बन सकते जब तक वह प्रेम का ढाई अक्षर न पढ़ ले. प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ने वाला ही इस संसार में

असल ज्ञानी है. उससे बड़ा विद्वान कोई और नहीं है.

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ- संत कबीर कहते हैं कि इस संसार को चलाने के लिए ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है. जो साफ समान को बचा लेता है और गंदा को बाहर निकालकर फेंक देता है.

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ-कबीरदास कहते हैं, कभी भी किसी को छोटा नहीं समझना चाहिए. जैसे एक छोटे से तिनके को आप कुचलकर आगे बढ़ जाते हैं, अगर वहीं तिनका आपके आंख में पड़ जाएं तो आपको बहुत पीड़ा होगी. आप कोई काम नहीं कर पाएंगे.

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ-कबीरदास कहते हैं किसी भी इंसान की जाति नहीं पूछनी चाहिए. उससे ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। आगे कहते हैं मोल तलवार का होता है न कि उसे ढकने वाले म्यान का.

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ: कबीर दास कहते है कि जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है. लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं ।

प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं ॥

अर्थ:  कबीर दास कहते है किजब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ. जब अहम समाप्त हुआ तभी प्रभु  मिले. जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ – तब अहम स्वत: नष्ट हो गया. ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ जब अहंकार गया. प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता – प्रेम की संकरी – पतली गली में एक ही समा सकता है – अहम् या परम ! परम की प्राप्ति के लिए अहम् का विसर्जन आवश्यक है.

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ: कबीर दास कहते है कि न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है.

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