मुजफ्फरपुर में डेढ़ सैकड़ा से ज्यादा माताओं के नोनिहल कालकलवित हो गए । ये ओ आंकड़े हैं जो सरकार और सरकार का जरखरीद गुलाम मीडिया बता रहा है । जबकि मरने वाले देश के भविष्य का आंकड़ा चार अंकों को पार कर चुका है । 

                  "सबै भूमि गोपाल की"

हमारे प्रधानमंत्री जानते हैं कि सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । दोनों हरदम साथ - साथ ही कदमताल करते रहते हैं ।  किसी के मरने से कुछ फर्क नहीं पड़ता । तभी तो बिहार के एक शहर में बच्चे मर रहे हैं, दूसरे शहर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी योग कर रहे हैं, तीसरे शहर की पांच सितारा होटल में "राम की चिड़िया राम का खेत खाओ री चिड़िया भरभर पेट"  की तर्ज पर देश के सबसे ज्यादा भूखे - नँगे - कंगलो - यतीमों को भोज दे रहे हैं । 

             "सिरफिरों के सिरफिरे सवाल"

देश के कुछ सिरफिरे बुद्धिजीवी सवाल उठा रहे हैं कि बच्चों के मरने पर प्रधानमंत्री ने एक शब्द तक नहीं बोला । केंद्रीय बाल बच्चे दार मंत्री किसी को अपना कंधा देने तक नहीं गईं । हर चीज बोल कर ही नहीं की जाती । कुछ चीजें कर के भी की जाती हैं ।

                   "मेंटेनेंस ज्यादा जरुरी"

बिहार में बच्चों की मौत पर बिहार में ही नरेन्द्र मोदी ने योग और भोज भोग कर अपनी आत्मीय सहिष्णुता का परिचय दे दिया । ठीक इसी तरह श्रीमती स्मृति ईरानी ने भी योग क्रिया कर्म कर बता दिया कि बच्चों के यम धाम गवन से उनकी सेहत पर कितना असर पड़ा है जिसे आगे मरने वाले बच्चों के लिए मेंटेन रखना जरूरी है । 

                     "सुरा, सुंदरी, सेहत"

वैसे भी अभी कोई चुनाव का समय तो है नहीं जो वोट बैंक में फर्क पड़ेगा । ठीक भी है जिस तबके से बच्चों को यमदूत ले गये हैं उस तबके के लोग वोट देते कहाँ हैं वे तो वोट बेचते हैं ये नेताओं को भलीभांति पता है । सुशासन बाबू को भी भलीभांति पता है कि विधानसभा चुनाव में जो भी मैदान में आयेंगे सबके सब हम बिरादर चोर के भाई गिरहकट ही तो हैं । अपने अपने मंच पर खड़े होकर एक दूसरे को गालियां बकिये फिर गलबहियां डालकर जाम टकराते हुए वीडियो क्लिप देखिए । 

               "यस सर यस सर के पुतले"

जुम्मा जुम्मा हुए आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर निष्कंटक पहुँचने के लिए खुद सहित हाँ में हिलने वाली 273 मुंडियों की जरूरत थी जनता ने 303 मुंडियों की व्यवस्था कर दी । 302 मुंडियों में एक भी ऐसी मुंडी नहीं है जो 303 वीं मुंडी के जायज गफलत का भी विरोध कर सके । आधुनिक युग के गुलामों की फौज से कुछ भी उम्मीद करना बेमानी है । जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना ।

                "नई बोतल में पुरानी शराब"

जिस तरह पिछले पाँच साल वन मैन शो था आगामी पाँच साल भी उसमें रत्ती भर बदलाव आने वाला नहीं है । इसका आभास केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने मुजफ्फरपुर जाकर दे दिया है । भाट मीडिया से भी तो देश की वास्तविकता जानने की आस करना समय बरबाद करने से अधिक कुछ नहीं है । बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय । जैसा बोया है वैसा ही तो काटना पड़ेगा । अब पछताये होत का जब चिड़िया चुग गई खेत ।

अश्विनी बड़गैंया, अधिवक्ता,
स्वतंत्र पत्रकार ।
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