जगन्नाथ रथ यात्रा / नीम की लकड़ी से होता है जगन्नाथ की मूर्ति का निर्माण

गुरुवार, 4 जुलाई से भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकलेगी। ये रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध है। देश-विदेश के लाखों भक्त इस यात्रा में शामिल होते हैं। रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं को तीन अलग-अलग रथों में विराजित किया जाता है।

भगवान की प्रतिमाएं कैसे बनाई जाती है
भगवान जगन्नाथ और अन्य प्रतिमाएं नीम की लकड़ी से बनाई जाती है। जब भी आषाढ़ का अधिक मास आता है, तब पुरानी प्रतिमाओं को प्रवाहित कर नई प्रतिमाओं का निर्माण किया जाता है। प्रतिमाओं का निर्माण करते समय छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखा जाता है जैसे भगवान जगन्नाथ का रंग सांवला होता है, इसलिए नीम का वृक्ष उसी रंग का होना चाहिए। भगवान जगन्नाथ के भाई-बहन का रंग गोरा है, इसलिए उनकी मूर्तियों के लिए हल्के रंग का नीम का वृक्ष ढूंढा जाता है।
रथ से जुड़ी खास बातें
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं। ये लकड़ी वजन में भी अन्य लकड़ियों की तुलना में हल्की होती है और इसे आसानी से खींचा जा सकता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है और यह अन्य रथों से आकार में बड़ा भी होता है। ये रथ बलभद्र और सुभद्रा के रथ के पीछे होता है।
भगवान जगन्नाथ के रथ के कई नाम हैं जैसे- गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष आदि। इस रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है, जिनका रंग सफेद होता है। इस रथ के सारथी का नाम दारुक है। भगवान जगन्नाथ के रथ पर हनुमानजी और नृसिंह का प्रतीक होता है। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ के रथ पर सुदर्शन स्तंभ भी होता है। यह स्तंभ रथ की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।
इस रथ के रक्षक भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ हैं। रथ की ध्वजा यानी झंडा त्रिलोक्यवाहिनी कहलाता है। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ नाम से जानी जाती है। बलरामजी के रथ का नाम तालध्वज है। इनके रथ पर महादेवजी का प्रतीक होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं।
सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। सुभद्राजी के रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक होता है। रथ के रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथ का ध्वज नदंबिक कहलाता है। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुड़ा कहते हैं।
मंदिर का स्वरूप कैसा है
जगन्नाथ मंदिर काफी विशाल है और कलिंग शैली में बना हुआ है। यहां की स्थापत्यकला बहुत ही सुंदर है। मुख्य मंदिर वक्र रेखीय आकार का है, इसके शिखर पर भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र लगा हुआ है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से बना है। मंदिर के अंदर मुख्य देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।


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