योगेश योगी/कलयुग की कलम

हम आज किसी खास स्कूल की बात नहीं कर रहे और न ही किसी खास तहसील या जिले की स्कूल की बात कर रहे हैं हम बात कर रहे हैं हर एक स्कूल में पढ़ने वाले उस मासूम बचपन की जो बस्ते के बोझ के तले दबा जा रहा है। बस्ते का अनावश्यक बोझ कुछ इस कदर बढ़ गया है कि वह नैनिहालों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। नर्सरी से पाँचवी कक्षा के बच्चों के बस्ते का बोझ अगर देखा जाए तो बड़ो के पसीने छूट जाते हैं फिर इन नन्हे  मुन्ने बच्चों पर क्या गुजरती होगी। अमूनन हर बच्चे के बस्ते का वजन 4 से 8 किलो  तक होता है जो कि नियम विरुद्ध है और बाल अधिकारों का हनन है, अगर नर्सरी से कक्षा 1 तक के बच्चों की बात की जाए तो उनका खुद का एवरेज वजन 12-16 किलो होता है लेकिन उनके इस दनावरूपी बस्ते का वजन 4-6 किलो के आसपास  होता है। 
अब हम नियम की बात करें तो स्कूल शिक्षा विभाग के उप सचिव प्रमोद सिंह के हस्ताक्षर से जारी आदेश में सभी कक्षाओं के हिसाब से वजन को सूचीबद्ध किया गया है और यह आदेश शिक्षा विभाग ने स्वयं संज्ञान लेते हुए नहीं निकाला बल्कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत्त सरकार के अक्टूबर 2018 के निर्देश, मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग एवम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार पर जारी किया गया है अब आप स्वयं इस बात का अंदाज़ा लगा सकते हैं मप्र का शिक्षा महकमा बच्चों के स्वास्थ्य और उनके भविष्य के प्रति कितना सजग है। दिन भर एसी में बैठकर कुर्सी तोड़ने वाले जिम्मेदार अधिकारी जिनके खुद के बच्चे यह बोझा रोज ढोते हैं लेकिन उन्हें इस इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि प्राइवेट विद्यालयों के द्वारा प्रदत्त गाँधी जी के मुस्कुराते हुए कागज सब कुछ भूल जाने को विवश कर देते हैं।
यदि हम मप्र में जारी सरकारी आदेश की बात करें तो उसमें  कक्षा 1 से 2 के लिए 1.5 किलो , कक्षा 3 से 5 के लिए 2-3 किलो, कक्षा 6 से 7 के लिए 04 किलो कक्षा 8 से 9 के लिए 4.5 किलो और कक्षा 10 के लिए 5 किलो तक का भार ही बच्चों के लिए सुविधाजनक माना गया है इससे अधिक वजन नियमों की अवहेलना में आता है, यह नियम सभी शासकीय, अशासकीय और अनुदान प्राप्त विद्यालयों के अध्ययनरत बच्चों के लिए जारी किया गया था किंतु इस नियम की खुलेआम स्कूल प्रशासन द्वारा धज्जियाँ उड़ाई जा रहीं हैं और प्रशासन खुद अपने नियम कानूनों को तामील करवा पाने में अक्षम नजर आ रहा है। आज तक किसी विद्यालय में किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने इस विषय पर कोई जाँच नहीं कि और उल्टे यही अधिकारी स्कूलों को बचाते रहने का प्रयास करते हैं और चेकिंग के नाम पर खाना पूर्ति करके चलते बनते हैं । जब हमारी टीम ने स्कूल के बच्चों के बस्तों का वजन किया तो पाया कि वजन शासन द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार न होकर उससे कहीं अधिक है एक नर्सरी के बच्चे के बस्ते का अधिकतम वजन 3.5 किलो और एवरेज 3 किलो तक मिला जिसमे की लंच बॉक्स और पानी की बोतल का भार नहीं जुड़ा। जब हमारी टीम ने डॉक्टर से इस असहनीय वजन के कारण बच्चों पर होने वाले प्रभाव के बारे में जानना चाहा तो हमीदिया अस्पताल भोपाल में पदस्थ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ स्वदेश ने बताया कि ज्यादा वजन की वजह से बच्चों पर मानसिक दबाब पड़ता है साथ ही उनकी हाइट और शरीर के डेवलोपमेन्ट में काफी बुरा प्रभाव पड़ता है अधिक वजन की वजह से बच्चे को सर्वाईकल जैसी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है साथ ही बच्चा दुबलेपन का शिकार भी हो सकता है इसलिए संतुलित भार का आवश्यक होना जरुरी है।
आज हालात ये है कि शिक्षा माफिया ने बच्चों को डंकी टॉयज़ में परिवर्तित कर दिया है जँहाँ महँगे-महँगे कोर्स के चक्कर मे किताबों कॉपियों को लादकर इस आपाधापी में बच्चे अपने भविष्य को दाव पर लागते जा रहे हैं और अभिभावक जो जरा-जरा सी बात पर बच्चे की केयर करते हैं वह इस संगठित अत्याचार पर मुँह बंद करके अपनी हामी भर रहे हैं और नैनिहालों पर हो रहे अत्याचार में भागीदार बने बैठे हैं।






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