लोकतंत्र के तीन स्तम्भ मजबूत चौथा कमजोर ........ ?

पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है कभी इस चौथे स्तंभ के बारे मे किसी ने सोचा या समझा नही जबकि यह चौथा स्तम्भ लाखो करोड़ो को सहारा नाम इज्जत सोहरत दिलाने का काम रकरता आया है। आज के दौर की अगर बात करे तो एक इमानदार पत्रकार से जादा गरीब कमजोर कोई नही। आज यह कौम समाप्ति की ओर है। आज का पत्रकार कभी नही चाहेगा की उसकी औलाद पत्रकार बने जिन अधिकारी नेताओं को हम भ्रष्टाचारी कहते हैं हम अपनी पीडि को वही बनाना चाहते हैं। मै खुद एक पत्रकार हू इस लिए दर्द व्या कर रहा हूं समाज के लिए सच बोलते बोलते न जाने कब मै पत्रकार बन गया। पत्रकार एक आईना भी माना जा रहा है किन्तु इस आइने मे इतने पत्थर मारे गये की यह टुकडो मे तपतीस हो गया। पत्रकार के लिए लाखो जुमले सुने गये किन्तु उन पर अम्ल आज भी नही हुआ देश समाज के रक्षक दिखावा करने के लिए इन ही पत्रकारों का उपयोग करते हैं किन्तु कोई पत्रकारों के हित मे दिखावा भी नही करना चाहता। आज का पत्रकार खबरो की  दौड मे पिछे रहजाता है तो इस लिए की वहके पास वाहन ईधन नही होता खबर लिखना तो चाहता है किन्तु दिमाग का संतुलन ठीक नही कर पा रहा परिवार की मागे कलम के सिपाही को कमजोर कर देती है। अंदर की बात तो यह है की हर पत्रकार खुश दिखता जरूर है किन्तु उतना ही अंदर से  टुटा हुआ होता है। हर वक्त खबरो को लेकर एक डर एक दहशत रातो की निद उडा देती है। खबर लिखने बाले छोटे छोटे पत्रकारों की बजह से ही आज मिडिया जगत जीवित है खबर तक अखबार का मालिक या बडे ओहदेदार लोग नही पहुचते मौत के इस खेल मे हाकर कहे जाने बाला पत्रकार ही इस जंग मे सामिल होता है और खबर की तस्वीर बनाता है। पत्रकारों पर उगली या भी बहुत लोगो द्वारा उठाई जाती है यह उगलीया उन्ही की होती है जो खुद को कभी आईने के सामने  नही देखते।आज के दौर मे कुछ ऐसे भी पत्रकार साथी है जो सिर्फ पत्रकारिता के नाम पर अवैध कार्यो मे लिप्त है पत्रकारिता सिर्फ अपने बचाव के लिए करते हैं।  आज इस पत्रकार जगत को चंद वरिष्ठ पत्रकार ही बचाए हुए है वर्ना यह सिर्फ बचाव का खेल बन कर रह गयी है।तमाम पत्रकार साथियों से यही विनम्र निवेदन है की  कल हम हो न हो यह कौम जीवित रहनी चाहिए पत्रकार को टूटने मत देना एक जुट होकर हर तरह की जंग मे उसका सहयोग साथ देना। यह जमाना उपयोग करना जानता है और फिर बुरे वक्त मे मुकरने का भी हुनर जानता है। 32 दातो की तरह हमारी आप की कौम है यारो कब किसकी चपेट मे आ जाए यह कोई नही जानता । कडवी बात तो यह है की  पत्रकार  यह भी नही जानता की उसकी कौन सी कलम उसकी आखरी कलम हो सकती है। समाज के हित मे लिखते लिखते वह चारो ओर से कभी दुश्मनो से घिर जाता है तो कभी खुद के हालातों से।

अक्सर टूटते वही है जो साहस की बात करते हैं दिल मे जख्म होता है फिर भी वो हस्ते ही रहते है

शेरा मिश्रा पत्रकार विजयराघवगढ़ 9893793302

Share To:

Post A Comment: