भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम आदमी ही देश का असली मालिक होता है। इसलिए मालिक होने के नाते जनता को यह जानने का हक है कि जो सरकार उसकी सेवा के लिए बनाई गई है। वह क्या, कहां और कैसे कर रही है। इसके साथ ही हर नागरिक इस सरकार को चलाने के लिए टैक्स देता है, इसलिए भी नागरिकों को यह जानने का हक है कि उनका पैसा कहां खर्च किया जा रहा है। जनता के यह जानने का अधिकार ही सूचना का अधिकार है। 2005 में देश की संसद ने एक कानून पारित किया जिसे सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के नाम से जाना जाता है। इस अधिनियम में व्यवस्था की गई है कि किस प्रकार नागरिक सरकार से सूचना मांगेंगे और किस प्रकार सरकार जवाबदेह होगी।

सूचना के अधिकार कानून के बारे में कुछ खास बातें:

सूचना का अधिकार अधिनियम हर नागरिक को अधिकार देता है कि वह -
सरकार से कोई भी सवाल पूछ सके या कोई भी सूचना ले सके.किसी भी सरकारी दस्तावेज़ की प्रमाणित प्रति ले सके.किसी भी सरकारी दस्तावेज की जांच कर सके.किसी भी सरकारी काम की जांच कर सके.किसी भी सरकारी काम में इस्तेमाल सामिग्री का प्रमाणित नमूना ले सके.

(धारा-2(क) और (ज) सभी सरकारी विभाग, पब्लिक सेक्टर यूनिट, किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता से चल रहीं गैर सरकारी संस्थाएं व शिक्षण संस्थाएं, आदि विभाग इसमें शामिल हैं. पूर्णत: निजी संस्थाएं इस कानून के दायरे में नहीं हैं लेकिन यदि किसी कानून के तहत कोई सरकारी विभाग किसी निजी संस्था से कोई जानकारी मांग सकता है तो उस विभाग के माध्यम से वह सूचना मांगी जा सकती है।

(धारा-5(1) हर सरकारी विभाग में एक या एक से अधिक लोक सूचना अधिकारी बनाए गए हैं। यह वह अधिकारी हैं जो सूचना के अधिकार के तहत आवेदन स्वीकार करते हैं, मांगी गई सूचनाएं एकत्र करते हैं और उसे आवेदनकर्ता को उपलब्ध कराते हैं।

(धारा-7(1)।लोक सूचना अधिकारी की ज़िम्मेदारी है कि वह 30 दिन के अन्दर (कुछ मामलों में 45 दिन तक) सूचना उपलब्ध कराए।

अगर लोक सूचना अधिकारी आवेदन लेने से मना करता है, तय समय सीमा में सूचना नहीं उपलब्ध् कराता है अथवा गलत या भ्रामक जानकारी देता है तो देरी के लिए 250 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 25000 तक का ज़ुर्माना उसके वेतन में से काटा जा सकता है। साथ ही उसे सूचना भी देनी होगी।

(धारा 6(2) लोक सूचना अधिकारी को अधिकार नहीं है कि वह आपसे सूचना मांगने का कारण पूछे ।

(धारा 7(5) सूचना मांगने के लिए आवेदन फीस देनी होगी (केन्द्र सरकार ने आवेदन के साथ 10 रुपए की फीस तय की है लेकिन कुछ राज्यों में यह अधिक है,  बीपीएल कार्डधारकों से सूचना मांगने की कोई फीस नहीं ली जाती है।

(धारा 7(6)   दस्तावेजों की प्रति लेने के लिए भी फीस देनी होगी. (केन्द्र सरकार ने यह फीस 2 रुपए प्रति पृष्ठ रखी है लेकिन कुछ राज्यों में यह अधिक है, अगर सूचना तय समय सीमा में नहीं उपलब्ध् कराई गई है तो सूचना मुफ्त दी जायेगी। )

(धारा 6(3) यदि कोई लोक सूचना अधिकारी यह समझता है कि मांगी गई सूचना उसके विभाग से सम्बंधित नहीं है तो यह उसका कर्तव्य है कि उस आवेदन को पांच दिन के अन्दर सम्बंधित विभाग को भेजे और आवेदक को भी सूचित करे। ऐसी स्थिति में सूचना मिलने की समय सीमा 30 की जगह 35 दिन होगी।

लोक सूचना अधिकारी यदि आवेदन लेने से इंकार करता है। अथवा परेशान करता है। तो उसकी शिकायत सीधे सूचना आयोग से की जा सकती है।

सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचनाओं को अस्वीकार करने, अपूर्ण, भ्रम में डालने वाली या गलत सूचना देने अथवा सूचना के लिए अधिक फीस मांगने के खिलाफ केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग के पास शिकायत कर सकते हैं।

लोक सूचना अधिकारी कुछ मामलों में सूचना देने से मना कर सकता है। जिन मामलों से सम्बंधित सूचना नहीं दी जा सकती उनका विवरण सूचना के अधिकार कानून की धारा 8 में दिया गया है।

लेकिन यदि मांगी गई सूचना जनहित में है तो धारा 8 में मना की गई सूचना भी दी जा सकती है।

जो सूचना संसद या विधानसभा को देने से मना नहीं किया जा सकता उसे किसी आम आदमी को भी देने से मना नहीं किया जा सकता।

(धारा 19(1 के तहत यदि लोक सूचना अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना नहीं देते है या धारा 8 का गलत इस्तेमाल करते हुए सूचना देने से मना करता है, या दी गई सूचना से सन्तुष्ट नहीं होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर सम्बंधित लोक सूचना अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी यानि प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील की जा सकती है )।

(धारा 19(3) यदि आप प्रथम अपील से भी सन्तुष्ट नहीं हैं तो दूसरी अपील 60 दिनों के भीतर केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग (जिससे सम्बंधित हो) के पास करनी होती है।

सूचना के अधिकार के विषय में सामान्य सवाल

मुझे सूचना कौन देगा? मैं आवेदन किसे जमा करूं?
सभी सरकारी विभागों के एक या एक से अधिक  अधिकारियों  को लोक सूचना अधिकारी  नियुक्त किया गया है। आपको अपना आवेदन उनके पास ही जमा करना है। यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे आपके द्वारा मांगी गई सूचना विभाग की विभिन्न  शाखाओं से इकट्ठा करके आप तक पहुंचाएं। इसके अलावा बहुत से अधिकारी  सहायक लोक सूचना  नियुक्त किए गए हैं। इनका काम  सिर्फ जनता से आवेदन ले कर उसे सम्बंधित  जन सूचना अधिकारी  के पास पहुंचाना है।

मुझे जन सूचना अधिकारी  के पते की जानकारी कैसे मिलेगी?
यह पता लगाने के बाद कि आपको किस विभाग से सूचना मांगनी है। लोक सूचना अधिकारी के विषय में जानकारी उसी विभाग से मांगी जा सकती है। पर यदि आप उस विभाग में नहीं जा पा रहे हैं या विभाग आपको जानकारी नहीं दे रहा तो आप अपना आवेदन इस पते पर भेज सकते है- लोक सूचना अधिकारी , द्वारा - विभाग प्रमुख (विभाग का नाम व पता। यह उस विभाग प्रमुख की ज़िम्मेदारी होगी कि इसे सम्बंधित  लोक सूचना अधिकारी  के पास पहुंचाए। आप विभिन्न सरकारी वेबसाइटों से भी लोक  सूचना अधिकारी की सूची प्राप्त कर सकते हैं ।www.rti.gov.in

क्या कोई जन सूचना अधिकारी मेरा आवेदन यह कह कर अस्वीकार कर सकता है कि आवेदन या उसका कोई हिस्सा उससे  सम्बंधित नहीं हैं?
नहीं वह ऐसा नहीं कर सकता। अनुच्छेद 6(3)  के अनुसार वह सम्बंधित विभाग के पास आपके आवेदन को भेजने और  इसके बारे में आपको सूचित करने के लिए बाध्य है।

यदि किसी विभाग ने लोक सूचना की नियुक्ति न की हो तो क्या करना चाहिए?
अपना आवेदन लोक सूचना अधिकारी द्वारा विभाग प्रमुख के नाम से नियत शुल्क के साथ  सम्बंधित सरकारी अधिकारी को भेज दें। आप अनुच्छेद 18 के तहत राज्य के सूचना आयोग से भी शिकायत कर सकते हैं। सूचना आयुक्त के पास ऐसे अधिकारी पर 25000 रूपये का जुर्माना लगाने का अधिकारी है। जिसने आपका आवेदन लेने से इनकार किया हैं। शिकायत करने के लिए आपको सिर्फ  सूचना आयोग को एक साधरण पत्र लिखकर यह बताना है कि फलां विभाग ने  अभी तक लोक सूचना  अधिकारी की नियुक्ति नहीं की है। और उस पर जुर्माना लगना चाहिए।

क्या लोक सूचना अधिकारी मुझे सूचना देने से मना कर सकता है?
लोक सूचना अधिकारी सूचना के अधिकारी कानून के अनुच्छेद 8 में बताए गए विषयों से सम्बंधित  सूचनाएं देने से मना कर सकता है। इसमें विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय सूचनाएं, सुरक्षा अनुमानों से सम्बंधित सूचनाएं, रणनीतिक, वैज्ञानिक या देश के आर्थिक हितों से जुड़े मामले, विधानमण्डल के विशेषाधिकार  हनन सम्बंधित मामले से जुड़ी सूचना शमिल हैं। फिर भी, यदि सूचना भ्रष्टाचार के आरोपों या मानवाधिकारो  के हनन से जुड़ी हुई है तो इन विभागों को भी सूचना देनी पड़ेगी।

क्या इसके लिए कोई शुल्क भी लगेगा?
हां, इसके लिए शुल्क निम्नवत है -
आवेदन शुल्क - 10 रूपये
सूचना देने का खर्च - 2 रू प्रति पृष्ठ
दस्तावेजों की जांच करने का शुल्क - जांच के पहले घंटे का कोई शुल्क नहीं पर उसके बाद हर घंटे का पांच रूपये शुल्क देना होगा। यह शुल्क केन्द्र व कई राज्यों के लिए ऊपर लिखे अनुसार है लेकिन कुछ राज्यों में यह इससे अलग है। 

मैं शुल्क कैसे जमा कर सकता हूं ?
आवेदन शुल्क के लिए हर राज्य की अपनी अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। आम तौर पर आप अपना शुल्क निम्नलिखित तरीकों से जमा करा सकते हैं-
स्वयं नकद जमा करा के (इसकी रसीद लेना न भूलें)

 डिमाण्ड ड्राफट भारतीय पोस्टल ऑर्डर, मनी ऑर्डर से (कुछ राज्यों में लागू) बैंकर्स चैक से केन्द्र सरकार से  मामलों में इसे एकाउंट आफिसर (Account Officer) के नाम देय होने चाहिए। कुछ राज्य सरकारों ने इसके लिए निश्चित खाते खोले हैं। आपको उस खाते में शुल्क जमा करना होता है। इसके  लिए स्टेट बैंक की किसी भी शाखा में नकद जमा करके उसकी रसीद आवेदन के साथ नत्थी करनी होती है। या आप उस खाते के पक्ष में देय पोस्टल ऑर्डर या डीडी भी आवेदन के साथ संलग्न कर सकते हैं। कुछ राज्यों में, आप आवेदन के साथ निर्धारित  मूल्य का कोर्ट की स्टैम्प भी लगा सकते हैं। 

मैं अपना आवेदन कैसे जमा कर सकता हूँ?
आप व्यक्तिगत रूप से, स्वयं लोक सूचना अधिकारी  या सहायक लोक सूचना अधिकारी के पास जाकर या किसी को भेजकर आवेदन जमा करा सकते हैं। आप इसे लोक सूचना अधिकारी या सहायक लोक सूचना अधिकारी के पते पर डाक द्वारा भी भेज सकते हैं। 

यदि लोक सूचना अधिकारी या सम्बंधित  विभाग मेरा आवेदन स्वीकार नहीं करता तो मुझे क्या करना चाहिए?
आप इसे पोस्ट द्वारा भेज सकते हैं। अधिनियम  की धारा 18 के अनुसार आपको सम्बंधित  सूचना आयोग में शिकायत भी करनी चाहिए। सूचना आयुक्त के पास उस अधिकारी के खिलाफ 25000  रू तक जुर्माना लगाने का अधिकार है, जिसने आपका आवेदन लेने से मना किया है। शिकायत में आपको सूचना आयुक्त को सिर्फ एक पत्र लिखना होता है, जिसमें आप आवेदन जमा करते समय पेश आने वाली परेशानियों के विषय में बताते हुए लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाने का निवेदन कर सकते हैं।

क्या सूचना प्राप्त करने की कोई समय सीमा है?
हां, यदि आपने जन सूचना अधिकारी के पास आवेदन जमा कर दिया है तो आपको हर हाल में 30 दिनों के भीतर सूचना मिल जानी चाहिए। यदि आपने आवेदन सहायक लोक सूचना अधिकारी के पास डाला है तो यह सीमा 35 दिनों की है। यदि सूचना किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतन्त्राता को प्रभावित कर सकती है तो सूचना 48 घंटों में उपलबध करायी जाती है। द्वितीय अनुसुची में शामिल संगठनों के लिए यह सूचना 45 दिनों में, तथा तृतीय पक्ष में 40 दिनों उपलब्ध कराने का प्रावधन है।

क्या मुझे सूचना मांगने की वजह बतानी होगी?
बिल्कुल नहीं। आपको कोई कारण या अपने कुछ ब्योरों (नाम, पता, फोन नं. के अलावा कोई भी अतिरिक्त जानकारी नहीं देनी पड़ती है। धारा 6(2) में यह स्पष्ट उल्लेख है कि आवेदक से उसके संपर्क के लिए ज़रूरी जानकारी के अलावा कोई भी जानकारी नहीं मांगी जानी चाहिए।

देश में बहुत से असरदार कानून हैं पर उनमें से कोई काम नहीं करता? आपको इतना विश्वास क्यों है कि यह कानून काम करेगा?

यह कानून काम कर रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वतन्त्रा भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा कानून बना है जो अधिकारियों  की लापरवाही पर तुरन्त उनकी सीधी  जवाबदेही तय कर देता है। यदि सम्बंधित अधिकारी आपको तय समय सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराता तो उसके बाद सूचना आयुक्त 250 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से उस पर जुर्माना लगा सकता है। यदि उपलब्ध कराई गई सूचना ग़लत है तो अधिकतम  25000 का जुर्माना लगाया जा सकता है। आपके आवेदन को फालतू बताकर जमा करने और अधूरी सूचना उपलब्ध कराने के लिए भी जुर्माना लगाया जा सकता है। यह जुर्माना अधिकारी की तनख्वाह से काटा जाता है।

क्या अभी तक किसी पर जुर्माना लगा है?
हां, केन्द्र और राज्य सूचना आयुक्तों ने कुछ अधिकारियों पर जुर्माने लगाए हैं. राजस्थान,महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश कर्नाटक, गुजरात और दिल्ली में कई अधिकारियों पर जुर्माना लगा है।

क्या लोक सूचना अधिकारी पर लगा जुर्माना आवेदक को मिलता है?
नहीं। जुर्माने की राशि सरकारी खजाने  में जमा होती है. हालांकि धारा 19 के अनुसार, आवेदक सूचना मिलने में हुई देरी के कारण हर्जाने की मांग कर सकता है।

यदि मुझे सूचना नहीं मिलती तो मुझे क्या करना चाहिए?
यदि आपको सूचना नहीं मिली या आप सूचना से असन्तुष्ट है, तो आप  अधिनियम  की धारा 19 के तहत प्रथम अपील अधिकारी  के पास प्रथम अपील डाल सकते हैं।

प्रथम अपील अधिकारी  कौन होता है?
हर सरकारी विभाग में लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ पद के एक अधिकारी को प्रथम अपील अधिकारी बनाया गया है। सूचना न मिलने या गलत मिलने पर पहली अपील इसी अधिकारी के पास की जाती है।

क्या प्रथम अपील के लिए कोई फॉर्म है?
नहीं, प्रथम अपील के लिए कोई  फार्म  नहीं है। (लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने फॉर्म निर्धरित किये है   प्रथम अपील अधिकारी के पते पर आप सादे काग़ज़ पर आवेदन कर सकते हैं। सूचना के अधिकारी के अपने आवेदन की एक प्रति  तथा यदि लोक सूचना अधिकारी की ओर से आपको कोई जवाब मिला है तो उसकी प्रति अवश्य संलग्न करें।

क्या प्रथम अपील के लिए कोई शुल्क अदा करना पड़ता है?
नहीं, प्रथम अपील के लिए आपको कोई शुल्क अदा नहीं करना है, हालांकि कुछ राज्य सरकारों ने इसके लिए शुल्क निर्धारित किया है, 

कितने दिनों में मैं प्रथम अपील दाखिल कर सकता हूं?
अधूरी  या गलत सूचना प्राप्ति के 30 दिन के भीतर अथवा यदि कोई सूचना नहीं प्राप्त हुई है तो सूचना के अधिकार  का आवेदन जमा करने के 60 दिन के भीतर आप प्रथम अपील दाखिल कर सकते हैं।

यदि प्रथम अपील दाखिल करने के बाद भी सन्तुष्टिदायक सूचना न मिले?

यदि पहली अपील दाखिल करने के पश्चात भी आपको सूचना नहीं मिली है तो आप मामले को आगे बढ़ते हुए दूसरी अपील कर सकते हैं।

दूसरी अपील क्या है?
सूचना के अधिकारी कानून के अन्तर्गत सूचना प्राप्त करने के लिए दूसरी अपील करना, अन्तिम विकल्प है। दूसरी अपील आप सूचना आयोग में कर सकते हैं। केन्द्र सरकार के विभाग के खिलाफ अपील दाखिल करने के लिए केन्द्रीय सूचना आयोग है। सभी राज्य सरकारों के विभागों के लिए लिए राज्यों में ही सूचना आयोग हैं।

दूसरी अपील के लिए क्या कोई फार्म सुनिश्चित है?
नहीं, दूसरी अपील दाखिल करने के लिए कोई फार्म सुनिश्चित नहीं है (लेकिन दूसरी अपील के लिए कुछ राज्य सरकारों के अपने निर्धरित फार्म भी है केन्द्रीय अथवा राज्य सूचना आयोग के पते पर आप साधारण  कागज पर अपील के लिए आवेदन कर सकते हैं। दूसरी अपील दाखिल करने से पूर्व अपील के नियमों को सावधनी पूर्वक पढ़ें, यदि यह अपील के नियमों के अनुरूप नहीं होगा तो आपकी दूसरी अपील ख़ारिज़ की जा सकती है। राज्य सूचना आयोग में अपील करने के  पूर्व राज्य के नियमों को ध्यान से पढें।

दूसरी अपील के लिए मुझे कोई शुल्क अदा करना पड़ेगा?
नहीं, आपको कोई शुल्क नहीं देना है (हालांकि कुछ राज्यों ने इसके लिए शुल्क निर्धारित किये है
कितने दिनों में मैं दूसरी अपील दाखिल कर सकता हूँ?
पहली अपील करने के 90 दिनों के अन्दर अथवा पहली अपील के निर्णय आने की तारीख के 90 दिन के अन्दर आप दूसरी अपील दाखिल कर सकते हैं।

सूचना के अधिकारों के दायरे में कौन कौन से विभाग आते हैं?
केन्द्रीय सूचना का अधिकारों  अधिनियम  जम्मू-कश्मीर के अलावा पूरे देश में लागू है। ऐसे सभी निकाय जिनका गठन संविधान के तहत, या उसके अधीन  किसी नियम के तहत, या सरकार की किसी अधिसूचना  के तहत हुआ हो इसके दायरे में आते हैं। साथ ही साथ वे सभी इकाईया जो सरकार के स्वामित्व में हों, सरकार के द्वारा नियन्त्रि त हों अथवा सरकार के द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से वित्तपोषित हों।

क्या निजी निकाय भी सूचना का अधिनियम  अधिनियम  के अन्तर्गत आते हैं?
सभी निजी निकाय जो सरकार द्वारा शासित, नियन्त्रित अथवा आंशिक वित्तपोषित होते हैं सीधे सीधे इसके दायरे में आते हैं। अन्य निजी निकाय अप्रत्यक्ष रूप से इसके दायरे में आते हैं। इसका मतलब है कि यदि कोई सरकारी विभाग किसी नियम कानून के तहत यदि निजी निकाय से कोई जानकारी ले सकता है तो उस सरकारी विभाग में निजी निकाय से जानकारी लेने के लिए सूचना के अधिकार  के तहत आवेदन किया जा सकता है।

क्या सरकारी गोपनीयता कानून, 1923 सूचना के अधिकार के आड़े नहीं आता है?

नहीं, सूचना का अधिकारी अधिनियम  2005 की धारा 22 के अन्तर्गत सूचना का अधिकार अधिनियम , सरकारी गोपनीयता अधिनियम  1923 सहित किसी भी अधिनियम  के ऊपर है। सूचना का अधिकार  कानून बनने के बाद सिर्फ वही सूचना गोपनीय रखी जा सकती है। जिसकी व्यवस्था इस अधिनियम  की धरा 8 में की गई है, इसके अलावा किसी सूचना को  किसी कानून के तहत गोपनीय नहीं कहा जा सकता।

यदि किसी मामले में सूचना का कुछ हिस्सा गोपनीय हो तो क्या शेष जानकारी प्राप्त की जा सकती है?
हां, सूचना का अधिकारी अधिनियम  के धारा 10 के अन्तर्गत, सूचना के उस भाग की प्राप्ति हो सकती है, जिसे धारा 8 के मुताबिक गोपनीय न माना गया हो।

क्या फाइल नोटिंग की प्राप्ति निषेध है?
नहीं, फाइल नोटिंग सरकारी फाइलों का एक अहम भाग है और सूचना के अधिकार  में इसे उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। यह केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा 31 जनवरी 2006 के एक आदेश में भी स्पष्ट किया गया है।

सूचना प्राप्ति के पश्चात मुझे क्या करना चाहिए?

इसका कोई एक जवाब नहीं हो सकता। यह इस बात पर निर्भर होगा कि आपने किस प्रकार की सूचना की मांग की है और आपका मकसद क्या है। बहुत से मामलों में केवल सूचना मांगने भर से ही आपका मकसद हल हो जाता है। लेकिन अगर आपने सूचना का अधिकार का उपयोग करके भ्रष्टाचार तथा घपलों को उजागर किया है, तो आप सतर्कता विभाग, सीबीआई में सबूत के साथ शिकायत दर्ज कर सकते हैं अथवा एफ आई आर दर्ज करा सकते हैं। कई बार देखा जाता है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद भी दोसियो के खिलाफ  कार्यवाही नहीं होती। सूचना के अधिकार के अन्तर्गत आप सतर्कता एजेंसियों पर भी उनके पास दर्ज शिकायतों की स्थितियों की जानकारी मांग कर दबाव डाल सकते हैं। घपलों को मीडिया द्वारा भी उजागर किया जा सकता है,  यह अधिकारियो  को एक स्पष्ट संकेत है कि क्षेत्रो  के लोग सतर्क हो गये हैं और पहले की भांति किया गया कोई भी गलत कार्य अब छुपा नहीं रह सकेगा। इस प्रकार उनके पकड़े जाने का खतरा बढ़ गया है।

क्या सूचना का अधिकार अधिनियम  के तहत सूचना मांगने और इस के माध्यम से भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वालों को परेशान किए जाने की भी संभावना है?
हां, कुछ ऐसे मामले सामने आये हैं, जिसमें सूचना मांगने वालों को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया। ऐसा तब किया जाता है जब सूचना मांगने से बड़े स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार का खुलासा होने वाला हो। ऐसा उन मामलों में हो सकता है जिनके सूचना मांगने से नौकरशाही और ठेकेदारों के बीच साठगांठ का पर्दाफाश हो सकता है या फिर किसी माफिया के गठजोड़ के बारे में पता चल सकता है।

फिर मैं सूचना के अधिकार  का प्रयोग क्यों करूं?
पूरी व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि यदि हम अकेले या साथ मिलकर इसे सुधारने की कोशिश नहीं करेंगें तो यह कभी ठीक नहीं होगी। और अगर हम कोशिश नहीं करेंगे तो और कौन करेगा इसलिए हमें प्रयास तो करना ही होगा। लेकिन हमें एक योजना बना कर इस दिशा में काम करना चाहिए ताकि कम से कम खतरों  का सामना करना पड़े। 

क्या सूचना पाकर लोग सरकारी कर्मचारियों को ब्लैकमेल भी कर सकते हैं?
इसका जवाब जानने से पहले हम खुद से एक सवाल पूछें- सूचना का अधिकार क्या करता है?

यह केवल सच्चाई को जनता के सामने लाता है। यह खुद  कोई सूचना नहीं बनाता। यह केवल पर्दा हटाता है और सच्चाई को जनता के  समक्ष लाता है । क्या यह गलत है इसका दुरूपयोग कब हो सकता है? तभी जब किसी अधिकारी ने कुछ गलत किया है और उसकी सूचना जनता के सामने आने में पकड़े जाने का खतरा हो. सरकार के भीतर चल रही गड़बड़ी अगर जनता के सामने आती है तो इसमें गलत ही क्या है। इसका सामने आना जरूरी है या इसको छुपाया जाना। हां, जब ऐसी कोई सूचना किसी के द्वारा प्राप्त की जाती है तो वह उस अधिकारी को ब्लैकमेल कर सकता है। पर हम गलत अधिकारियो  की रक्षा क्यों करें। यदि किसी अधिकारी को ब्लैकमेल किया जा रहा है तो वह भारतीय, दण्ड संहिता के तहत ब्लैकमेल के खिलाफ एफ.आई.आर. कराने के लिए स्वतन्त्रा है। अधिकारी को ऐसा करने दीजिए। फिर भी हम आवेदन द्वारा मांगी गई सारी सूचना को वेबसाइट पर डालकर किसी के द्वारा किसी को करने ब्लैकमेल की संभावना को दूर कर सकते हैं। आवेदक उस स्थिति में अधिकारी को ब्लैकमेल कर सकता है जब सिर्फ आवेदक को ही सूचना मिली हो और वह उसे आम करने की धमकी दे रहा हों। पर जब सभी जानकारियां वेबसाइट पर डाल दी जाएंगी तो ब्लैकमेल करने की संभावना अपने आप खत्म हो जाएगी।

क्या सरकार के पास सूचना के लिए आवेदनों का ढेर लग जाने से सामान्य सरकारी कामकाज प्रभावित नहीं होगा?
ये डर निराधर है। दुनिया में 68 देशों में सूचना का अधिकार सफलतापूर्वक चल रहा है। संसद में इस कानून के पास होने से पहले ही देश के नौ राज्यों में यह कानून लागू था। इनमें से किसी राज्य सरकार के पास आवेदनों का ढेर नहीं लगा। ये निराधर बातें उन लोगों के दिमाग की उपज है जिनके पास करने को कुछ नहीं है और वे पूरी तरह निठल्ले हैं। आवेदन जमा करने की कार्यवाही में बहुत समय, ऊर्जा और कई तरह के संसाधन खर्च होते हैं। जब तक किसी को वाकई सूचना की जरूरत न हो तब तक वह आवेदन नहीं करता।
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