सावन के महीने में झूले का लुत्फ उठाती गाँव की महिलायें

KKK न्यूज रिपोर्टर सुभाष चंद्र नैनी        

प्रयागराज पहले सावन का महीना आते ही गांव के मोहल्लों में झूले पड़ जाते थे और सावन की मल्हारें गूंजने लगती थीं। ग्रामीण युवतियां महिलाएं एक जगह देर रात तक श्रावणी गीत गाकर झूला झूलने का आनंद लेती थीं। वहीं जिन नव विवाहिता वधुओं के पति दूरस्थ स्थानों पर थे उनको इंगित करते हुए विरह गीत सुनना अपने आप में लोक कला का ज्वलंत उदाहरण हुआ करते थे। झूले की पैंगों पर बुदियों भी जोशीले अंदाज में गायन शैली मात्र यादों में सिमट कर रह गई है। सामाजिक समरसता की मिसाल, जाति पाति के बंधन से मुक्त अल्हड़पन लिए बालाएं उनकी सुरीली किलकारियां भारतीय सभ्यता को अपने में समेटे हुए सांकेतिक लोकगीत जैसे किसी दिली आकांक्षा की कहानी क्यों करते थे उसका अंदाज ही निराला था। समय के साथ पेड़ गायब होते गए और बहुमंजिला इमारतों के बनने से आंगन का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया। ऐसे में सावन के झूले भी इतिहास बनकर हमारी परम्परा से गायब हो रहे हैं। अब सावन माह में झूले कुछ जगहों पर ही दिखाई देते हैं। जन्माष्टमी पर मंदिरों में सावन की एकादशी के दिन भगवान को झूला झुलाने की परम्परा जरूर अभी भी निभाई जा रही है।
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