मेरी कलयुग की कलम से

       "संपादकीय"

एम एस पटेल सम्पादक 

धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो

यह बात हर धार्मिक कार्य पूर्ण होने के बाद घर पर या धार्मिक आयोजन के पश्चात् जयकार के रूप में सुनाई देती है, ये ही आस्थाएं समाज निर्माण में ठोंस रूप से कार्य करती है जिसमे व्यक्ति के निर्माण में चार चाँद लगा देती है फिर भी है जगह मसखरे लोग रहते है, जो जयकार तो करते है लेकिन जीवन में इस चीज़ को उतारते नहीं| इसी से सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक व्यक्तियों में आचार एवं वैचारिक एकाग्रता का भाव जाग्रत ना होकर व्यक्ति विचार में लिप्त हो जाता है और इनकी आड़ में अनैतिक कार्य कर प्रत्येक क्षेत्र में भ्रम उत्पन्न कर उचाईयों पर पहुंचते है|

मीडियाकर्मी ही एक ऐसी शख्सियत है जो चरित्रहीन लोगों को समाज के सामने बेनकाब करता है| मीडिया द्वारा समाज राजनेता पर पूर्ण नियंत्रण रखने के लिए यह आवश्यक है की उनकी छवि भी ठीक रहे| इस कारण से समाज में बहुत सारी बुराइयां है उन सबको दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है| परोक्ष रूप से आधुनिक सम्माज और भीड़तंत्र को अनुशासन में रहने के लिए मजबूर करती है| आजकल शिक्षा से सत्यता समाप्त हो रही है| निर्माण की प्रक्रिया इसी कारण से प्रत्येक क्षेत्र में बाधाओं की दौड़ से गुज़र रही है| उक्त भावों का अर्थ प्राथमिक शिक्षा से एकाग्रता होकर परिवार में ही सिखाया जाए तो परिवार का निर्माण ठीक होगा तो भाई को भाई, बेहेन को बेहेन एवं पिता को पिता तथा काका-काकी आदि को सम्मानीय व्रती से पूजेगा, जो की समाज में निरंतर रूप से गिर रही सांख को बचा पायेगा|

हमारे क़ानून ने मानव को स्तरहीन बना दिया है| और ये स्तरहीन समाचार रोज़ सवेरे उठकर समाचार पर या टीवी पर देख सकते है| अतः आज ज़रूरत है कि इन सब पर नियंत्रण तभी हो पायेगा तब पारिवारिक शिक्षा होगी|अतः हर घर में बड़ों को प्रातःकालीन प्राम, सूर्योदय के पहले उठाना और बच्चों कि पढ़ाई पर समय चक्र के अनुसार कार्य करने कि लत डाल दी जायेगी और प्रातःकालीन प्रार्थना और सायंकालीन प्रार्थना में इन सब जयकारो के साथ अपने कार्य कि आदत डालेंगे तो विश्व में सभी परिवार एक जैसे हो जाएंगे और विश्व का कल्याण भारत जैसा देह अवश्य करेगा|

Share To:

Post A Comment: