प्रवास के बारे में इतनी हाय-हाय क्यों है, जो एक प्राकृतिक मानवीय घटना हैसम्पपा

 संपादक महेंद्र सिंह पटेल/कलयुग की कलम /

आश्चर्य है कि बहुत से बाहरी लोग  असम के इतिहास को नहीं जानते हैं। समाजवादी राजनीतिक घटनाओं को स्वाभाविक बनाने का ऐसा प्रयास किया गया है जो कि एक बौद्धिक मूर्खता है। राज्य की असंतोष की कोपलें 20 वीं सदी के शुरुआती दशकों में फूटने लगी थी। 

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के काल मे एक सदी से अधिक समय तक गरीब पूर्वी बंगाल के किसानों को बर्बाद करने के बाद, बड़े पैमाने पर किसान विद्रोह हुआ और बाद के असम के प्रवास को बढ़ावा मिला। 20 वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में कुछ एक परिवारों के रूप में बूंदाबांदी जैसा शुरू हुआ यह पुनर्वास, 1930 के दशक और 40 के दशक में जलप्रलय में बदल गया।

अंग्रेजों ने देशी असमिया लोगों के बीच एक झूठा अलार्म जगाया कि इन प्रवासियों के द्वारा, उनकी ज़मीनों को 'छीन' लिया जा रहा है और उनकी संस्कृति को 'दफना' दिया जा रहा है । 1931 में जनगणना अधीक्षक सी.एस.मुल्लन द्वारा की गई भड़काऊ टिप्पणियों ने स्थिति को और खराब कर दिया, जिससे चिंता घबराहट में बदल गई।

 मौलाना भसानी जैसे मुस्लिम नेताओं ने नए प्रवासियों और पाकिस्तान में असम को शामिल करने के लिए जमीनों की मांग करके इस आग में घी का काम किया। 

हालांकि, आजादी के बाद, जब उनके नेता भासानी पूर्वी पाकिस्तान चले गए और अपने लाखों अनुयायियों को किंकर्तव्यविमूढ़ जैसी में छोड़ दिया, तो आगे उनके भाग्य का फैसला भारत सरकार के साथ बातचीत और स्थानीय नेताओं के माध्यम से हल एवम राहत प्राप्ति पर निर्भर रहा।

सौभाग्य से, असमिया संस्कृति, सद्भावना पूर्ण और अनेकता में एकता पर विश्वास करने वाली संस्कृति है।

असम ने विविधता को सहन किया और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और भ्रातृ संबंधों को बढ़ावा दिया। लेखकों ज्योति प्रसाद अग्रवाल, बिष्णु प्रसाद राभा और गायक-संगीतकार भूपेन हजारिका जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों ने उस परंपरा को बरकरार रखा और 1979 में शुरू होने वाले असम आंदोलन तक, रिश्ते सौहार्दपूर्ण बने रहे।






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