मेरे बचपन की यादें

शायद  वर्ष 1970-71 के आसपास की बात है,उन दिनो मै बालाघाट जिले के बैहर तहसील में रहता था ।मेरे पापा उन दिनो बैहर के लोक निर्माण विभाग में स्टोरकीपर के पद पर नियुक्त थे ।

मै उस समय आठवी या नवमी कक्षा में पढता था । मै सभी भाई बहनो में सबसे बड़ा था,मुझसे चार बहने छोटी थी ।

पापा को शासकीय क्वाटर मिला था जो कि मिशन स्कूल रोड पर पापा के ऑफिस के ठीक सामने ही था,बहुत खुशहाल परिवार था हमारा ।

एक दिन हम कुछ दोस्तों ने मिलकर एक प्लान बनाया और फिर स्कूल से दो बजे के लंच की छुट्टी के बाद घर आकर पुनःस्कूल तो रवाना हुए लेकिन स्कूल न जाकर बालाघाट रोड पर इकलौते नए नए खुले सिनेमा हॉल जयहिन्द टॉकीज में हम सब दोस्त जा पंहुचे,हलांकि घर से निकलते समय मैने मम्मी से बता दिया था कि हम सब दोस्त फिल्म देखने जा रहे हैं ।पापा से मत बताना।

उस दिन वहां फिल्म जो हमने

 देखी वो थी    

संपूर्ण रामायण"

बहरहाल हम लोगों ने बड़े मजे से पूरी फिल्म देखी।इधर आशा के विपरीत हुआ ये कि मेरे पापा अचानक  मेरे स्कूल पहुंच गए और प्राचार्य महोदय के कक्ष में पहुंचकर मुझे बुलवा भेजा,तब उन्हे पता चला कि आज मन्तोष हाफ टाइम से स्कूल नही आया और उसके साथ में चार पांच लड़के उसके वो भी गायब हैं ।

सुनकर पापा आग बबूला हो गए, फिर पता नही कैसे उन्हे  ये शक हुआ कि हो न हो ये सब फिल्म  देखने गए हैं ।

इधर फिल्म छूटने के बाद हम सब मित्र आपस में हंसीमजाक करते वापस लौट रहे थे,तभी मेरे एक मित्र नरेश ने मेरे कान में फुसफुसाया अबे मन्तोष तेरे पापा  आ रहे हैं उधर देख ।

मैने घबराकर नजरे दौड़ाई सचमुच सामने पापा मेरी ही तरफ बढते चले आ रहे थे,मारे दहशत के मेरी दशा तो ये हो रही थी कि काटो तो खून नही ।

पापा के मेरे पास आते ही सभी मित्र मुझे वहां अकेला छोड़ भाग गए,मै भला कहां जाता ? 

बस फिर क्या था भरे बाजार में मुझे पापा ने खूब मारा,वैसे भी पापा का स्वभाव बहुत तेज था,गुस्सा बहुत जल्द आ जाता था,लेकिन बाद में उन्हे पछतावा भी होता था । तभी तो बाद में कहते थे बेटा ऐसा काम क्यों करते हो ? कहते हुए उनकीआंखों से समंदर छलक आता था ।

वो शरारत भरे दिन आज भी भुलाए नही भूलते ।

        डॉ.मन्तोष भट्टाचार्य जबलपुर (म.प्र)

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