राजनीति में हथधर्मीयता ओर आदतन बनती आलोचक छबि

कलयुग की कलम पत्रिका न्यूज़ बड़वानी 

राजनीति में आलोचक का स्थान भी महत्वपूर्ण माना जाता है। विपक्ष द्वारा सत्ताधारियों की आलोचना कर  सत्ता को जनहितैषी कार्य करने के लिए विवश करना एक महत्वपूर्ण हथियार है। 

लेकिन हर वक्त, हर मुद्दे पर विपक्ष द्वारा आलोचना करना भी गलत हो सकता है। यह जरूरी नही की सत्ताधारी नेता हर काम गलत ही कर रहे हो! विपक्ष में बैठे नेताओ ने भी अपनी जवाबदेही तय करना चाहिए, हर मुद्दे पर सिर्फ आलोचना करना ठीक नही। देश और प्रदेश हित में लिए गए अच्छे निर्णय वर्तमान से हटकर आने वाले सुनहरे भविष्य को तय करते है। 

वर्तमान में देश की राजनीति मानसिक दयनीय स्थित से गुजर रही है। सत्तापक्ष पूर्ण बहुमत के *घमंड में हठधर्मिता* भी कर रहा है तो वही विपक्ष भी सत्तापक्ष के हर निर्णय के  विरोध में आलोचना कर रहा।

विपक्ष दल द्वारा हर मुद्दे पर सत्तापक्ष की आलोचना करने से स्वयं अपनी छबि *आदनत आलोचक की बना रहा है।* जो स्वयं विपक्ष के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही।

देश की वर्तमान सरकार कार्यकाल में जहां एक ओर लोकतंत्र पर हावी भीड़तंत्र, भ्र्ष्टाचार, भेदभाव, नारी सुरक्षा, असमानता, महंगाई, बेरोजगारी जैसी विफलता है तो दूसरी ओर धारा 370 हटाना एवं स्वच्छता अभियान को सफल बनाना ये दो काम सरकार के सफल कार्य है जो काबिले तारीफ है। किन्तु चंद कुछ कामों से सरकार की वाहवाही ज्यादा समय तक नही टिक सकती। सरकार को सर्वधर्म सम्मान के साथ साथ सभी को शिक्षा- चिकित्सा और सुरक्षा हर स्थिति में देना ही ऐतिहासिक काम होंगे।

सरकार की सफलता और विफलता की बहुत लंबी सूची बन सकती है। लोकतंत्र में पूर्ण जनादेश का लाभ सत्ताधारी दल ले रहे है, कही कही इस जनादेश के गलत तरीके से अलोकतांत्रिक लाभ लेने का आभास भी होता रहा जो आलोचनीय कृत्य है।

एक अच्छा आलोचक वही है जो आलोचना के साथ साथ सराहनीय सर्वहितैषी फैसलों का सम्मान के साथ समर्थ करे , जिससे स्वयं की छबि भी धूमिल होने से बची रहे और अन्य लोग भविष्य में भी उनकी आलोचना को गम्भीरता से लेता रहे।

सत्ताधारी पक्ष ओर विपक्षीय दल दोनों ने आत्म मंथन ओर चिंतन करना चाहिए जनहित में क्या सही कदम उठाए गए और कितना कुछ करना शेष है जिससे देश के अंतिम व्यक्ति को भी एहसास हो कि वह भी देश का नागरिक है जिसकी चिंता देश की राजनीति को प्रथमिकता से है।

बलराम यादव, बड़वानी

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