🔻🔻मेरा मतलब यह नहीं कि पूजा-पाठ छोड़ दिए जाएं। मन की शांति के लिए यह सब करना भी जरूरी है। पर यदि मेरे लिए लेटे-लेटे चरखा चलाना संभव हो और मुझे लगे कि इससे ईश्वर पर मेरा चित्त एकाग्र होने में मदद मिलेगी तो मैं जरूर माला छोड़कर चरखा चलाने लगूंगा। 🔻🔻🔻🔻🔻🔻

चरखा चलाने की शक्ति मुझमें हो और मुझे यह चुनाव करना हो कि माला फेरूं या चरखा चलाऊं, तो जबतक देश में गरीबी और भुखमरी है, तबतक मेरा निर्णय निश्चित रूप से चरखे के पक्ष में होगा और उसी को मैं अपनी माला बना लूंगा।🔻🔻🔻🔻🔻🔻

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