प्रतिमाह लाखो रुपये का भत्ता लेने वाले करेंगे राष्ट्र-निर्माण?

कलयुग की कलम पत्रिका न्यूज़ 

चुनाव के समय चुनावी मंचो से  राजनीति पार्टियों के नेताओ के तेजस्वी भाषण ओर राष्ट्र निर्माण के बड़े बड़े दावे किए जाते है। दावे भी ऐसे होते है कि सुनने वाली जनता को यकीन हो जाता है कि यही बंदा सच्चा देशभक्त है और यही राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान देकर हम सब का भला कर सकता है!

जनता तो बेचारी है चुनाव में अक्सर ठगी जाती रही है, फिर भी नेताओ के लोकलुभावन बातों में आ ही जाती है। वर्तमान में अक्सर नेताओ के मुंह से सुनने को मिलता है कि सत्ता में आते ही  *राष्ट्रनिर्माण* करेंगे चाहे इसके लिए अपने *प्राणों* की आहुति भी क्यो न देनी पड़े!

यही नेता चुनाव भी जीतते है और सत्ता में भी आते है लेकिन राष्ट्रवाद और राष्ट्र निर्माण के नाम पर दिखावा करते है, सत्ता बदलते कई बार देखा लेकिन हालात बदलते बहुत कम देखने को मिलता है। बदलाव के नाम पर नेताओ को अपने वादों से बदलते जनता ने अनगिनत बार जरूर देखा है।

सत्ता में आते ही सबसे पहले स्वयं के सेवा भत्तों में *लाखो रुपयों* की भारी बढ़ोतरी के बिल पास करवाये जाते। स्वयं  के आलीशान *बंगलो* ओर *सुविधाओ* की मांग करने लगते है। चुनाव में जनता से किये वादे भूल जाते है। यह बीबी भूल जाते है कि चुनाव के समय मंच से यह कहा गया था कि तन-मन-धन से राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र की सेवा करेंगे जरूरत लगी तो प्राणों की आहुति भी देंगे!

सेवा भत्तों के नाम पर लाखों का फायदा देखने वाले नेता कैसे राष्ट्रनिर्माण करेंगे? बात देने की हुई थी लेकिन यहां तो चुनाव जीतते ही सिर्फ लेने की लूट मचाई जाती है!

राष्ट्र निर्माण की बातें अब सत्ता तक पहुचने ओर सत्ता मिलते ही स्वयं का निर्माण करने  मात्र का साधन बन गया। यदि सच्ची देशभक्ति होती तो सर्वप्रथम राष्ट्रहित में स्वयं के व्यय पर राष्ट्रनिर्माण की अवधारणा रखते, ओर जरूरत पड़ने पर स्वयं चंदा कर या अपना धन को राष्ट्र कोष में धन जमा करते, ठीक वैसे ही जिस तरह तन-मन-धन से चुनाव जीतने में लगाते है।

जिस जिस पर विश्वास किया उसने जनता को दगा दिया

जिसे मौका मिला उसने लुटा!

बलराम यादव, बड़वानी

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