मंदिर या मस्जिद में भेदभाव ना हो समानता और एकता दिखाई दे

ईश्वर ने इंसानों को जगह दी है और इंसानों को सृष्टि का नायब इंसान बना कर उतारा है। इसलिए की पूरी धरती में जितने भी प्रकार के प्राणी हैं और सर्वप्रथम मानव सेवा ऊंच-नीच छोटा बढ़ा ना देखते हुए उनकी रक्षा सुरक्षा स्वाभिमान और गरीबों का साथ सहयोग और उनकी मदद कर सकें । फिर मस्जिद मंदिर गुरुद्वारे में भेदभाव नहीं करना चाहिए कम से कम हिंदू हिंदुओं को तो मंदिर में स्थान दें फिर दलित आदिवासी हरिजन ना देखें और मुसलमान मुसलमानों को स्थान दें मुसलमान चाहे फकीर साह हो या गदा चाहे मिनिस्टर  एक ही कतार में खड़े हो और खड़े होते हैं। मस्जिद में किसी बड़े व्यक्ति या प ओहदेदार को देखकर सब वेलकम करने नहीं खड़े होते जो जो पहले आता है और देर से आता है। वह अपने हिसाब से जो खाली स्थान होता है वहां पर खड़े होकर अपनी नमाज अदा करता है। एक ही सफ में खड़े हो गए महमूदो अयाज़ ना रहा कोई बंदा ना कोई बंदा नवाज़ जो जो पहले मस्जिद या मंदिर में पहुंचेगा वह पहली कतार में खड़ा होगा मस्जिद का इमाम जो नमाज़ अदा कराता है अगर वह भी समय से नहीं आता है। तो जो नमाजी नमाज़ पढ़ने आए हुए हैं उसमें जो जानकार नमाजी है उसे नमाज पढ़ाने की इज़ाजत दी जाती है । और वह नमाज पढ़ाता है और लेट से आए इमाम साहब पीछे नमाज़ पढ़ते हैं। इसी प्रकार अन्य अमल में भी किया जाता है। अगर इस प्रकार अल्लाह ईश्वर के बाद की जाए तो भेदभाव समाप्त हो जाएगा और कोई भी व्यक्ति दुर्बल और छोटा नहीं समझेगा ईश्वर के सामने हर इंसान बराबर और श्रेष्ठ हैं।

लेखक  अब्दुल कादिर खान  कलयुग की कलम  मोबाइल 9753687489

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