हिंदू ज्ञानवान, बुद्धिमान, सहिष्णु, उदार और 'संतोषम परम सुखम' को मानने वाली कौम है। शक्तिशाली और पराक्रमी होकर भी कभी विदेशी आक्रांताओं से एकजुट हो लड़ने की समझ नहीं महसूस कर सके न ही विकसित कर सके। मुगलों, अंग्रेजों, फ्रांसीसियों के आक्रमणों और लगातार कई सौ वर्षों तक गुलाम रहा फिर भी उसकी संस्कृति नष्ट नहीं होती है बल्कि ये सब हिन्दू में घुल-मिल कर रह जाते हैं। हिन्दू इन सबको अपने में समाहित कर लेता है। हिंदू राम और कृष्ण को मानते हैं। राम रावण का वध करते हैं, परन्तु भाई को रावण के पास ज्ञान प्राप्त करने भेजते हैं। अर्थात रावण की बुराई का अंत कर उसके ज्ञान के प्रति आस्था है आकर्षित हैं। हिंदू अपने मे सब कुछ समाहित कर लेता है। राम का मर्यादा पुरुषोत्तम होना ही हिंदू को ग्राह्य है।  सम्राट अशोक भी अपनी सीमा विस्तार के लिए युद्ध करते करते उनमें हिन्दुत्व जाग जाता है और युद्ध त्याग कर हथियार सदा के लिए खूंटी पर टांग देते हैं।  हिंदू किसी भी भाव के अतिरेक में नहीं जीता है न ही जीना चाहता है। हिन्दू शांति से जीना चाहता है और जीना जानते हैं, युद्धोन्माद क्षणिक हो सकता है अन्यथा हिन्दू शांति का ही पुजारी है। आज हिन्दू समाज, समुदाय को एक नई पहचान और दिशा देने की कोशिश की जा रही है, जो क्षणिक उत्तेजना और उन्माद तो जगा सकती है परन्तु यह हिन्दू चरित्र नहीं है और न ही यह चरित्र विकसित हो सकेगा, यह वर्तमान और भविष्य की सरकारों को समझ लेना चाहिए। इसी में हमारे विकास और उज्ज्वल भविष्य की कामना और संभावना छिपी है।

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