मजार कब्रिस्तान व सत्तिहा चबूतरा को जमीदोज करने की तैयारी

KKK न्यूज रीवा/जल-जंगल-जमीन बचाओ मोर्चा मध्यप्रदेश के संयोजक शिव सिंह एडवोकेट एवं समाज सेवी इदरीस खान ने आज अमवा पहुच कर सत्तिहा तालाब का निरीक्षण कर राजस्व अमले एवं ग्राम पंचायत तथा अतिक्रमणकारियों के विरूद्ध तालाब के स्वरूप व मजार, कब्रिस्तान, सत्तिहा चबूतरा को नष्ट करने का आरोप लगाते हुये जिला प्रशासन से तत्काल तालाब को आम निस्तारी शासकीय घोषित करने व दोषियों के विरूद्ध कार्यवाही करने की मांग की है व इस संबंध में मंगलवार 03 दिसम्बर को जिलाध्यक्ष रीवा को ज्ञापन सौंपने का निर्णय भी लिया गया है। मामले का खुलासा करते हुये श्री सिंह ने बताया कि तहसील हुजूर ग्राम पंचायत अमवा में स्थित सत्तिहा तालाब भूमि नं0 पुराना 369 रकवा 3 एकड़ 52 डिसमिल एवं भूमि नं0 370 रकवा 6 एकड़ 39 डिसमिल यानी कुल लगभग 10 एकड़ में तालाब एवं भीटा तथा शेष 4 एकड़ 44 डिसमिल में 1947 के पूर्व से सत्तिहा चबूतरा देवस्थान व मजार एवं कब्रिस्तान तथा बाग बगीचा मौजूद है, जिसका नया नम्बर 391, 392, 393 है। तालाब के भीटे पर महुआ के 20 पेड़, आम के 30 पेड़, व अन्य पेड़ बाग के रूप में मौजूद थे, उक्त बन्दोबस्ती निस्तारी तालाब 1924-25 एवं खसरा वर्ष 1956 से 1960-61 में दर्ज तालाब निरंतर चला आ रहा है। राज्य शासन के आदेश का पालन करते हुये 02.10.1959 के पूर्व से निर्मित तालाब के संबंध में वर्ष 1956 से 1960-61 के खसरे में शासकीय दर्ज करने का आदेश किया जा चुका था लेकिन राजस्व कर्मचारियों की मिलीभगत से राजस्व खसरो में कूटरचना करते हुये खसरा वर्ष 1956 से 1960-61 में भिन्न-भिन्न स्याहियों से कालम नं0 5 में बिना किसी वैध सक्षम अधिकारी के आदेश के राजस्व खसरो में परिवर्तन किया गया है और उसी परिवर्तन का नाजायज लाभ लेते हुये वर्तमान भूमि स्वामियों द्वारा राजस्व हल्का पटवारी व अधिकारियों को प्रभाव में लेकर तालाब के भीटे की आराजी नं0 369/1, 369/2, 369/3 अंकित कराया गया जिसका नया नम्बर 391, 392, 393 अधिकार अभिलेख में प्रविष्टि दर्ज की गई है। जबकि म0प्र0भू-राजस्व संहिता में यह स्पष्ट रूप से प्रावधान निर्मित किये गये है कि तालाब के रूप में दर्ज भूमियों का बटवारा किये जाने का माल न्यायालय को अधिकार नही है, ऐसी स्थिति में जो भी प्रविष्टियां राजस्व खसरे में दर्ज की गई है वह अनाधिकार प्रविष्टि की श्रेणी में आता है। जबकि राजस्व खसरा वर्ष 1956 से 1960-61 में शासकीय दर्ज करने का उल्लेख है। इसके बाद भी शासकीय भूमि होते हुये भूमि स्वामी खाते में प्रविष्टि दर्ज है। जिसका नाजायज लाभ लेते हुये निर्मित तालाब के स्वरूप को मिट्टी खोद कर व 80-90 वर्ष पुराने वृक्ष काट कर शासन को करोड़ो की क्षति पहुचाई गई है, तालाब की तीन मेड़ो को नष्ट करने के बाद अब मजार, एवं कब्रिस्तान तथा सत्तिहा चबूतरा को जमीदोज करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसको लेकर आम जनता आक्रोसित है। उक्त कृत्य के लिये पूर्ण रूप से हल्का पटवारी, सरपंच, सचिव एवं रोजगार सहायक तथा अतिक्रमणकारी दोषी है। ऐसे तालाबो को जो कि बन्दोबस्त के समय से निर्मित है जिन्हे शासन म0प्र0 में दर्ज किया जाना चाहिए लेकिन शासन के दिशा निर्देशो का पालन नही किया जा रहा है। जिसकी प्रविष्टि का नाजायज लाभ लेते हुए अवैधानिक तरीके से बिना नवइयत परिवर्तन कराये वगैर भूमि स्वामियों द्वारा आम निस्तारी तालाबो की बिक्री कर स्वरूप मंे परिवर्तन किया जा रहा है। जबकि जिलाध्यक्ष द्वारा एक प्रशासकीय आदेश 18/8/भूअभिलेख/1991/रीवा दिनांक 23.10.1991 को जारी कर समस्त निस्तारी तालाबो के संबंध में विक्रय पर रोक लगाई गई थी। जिसका पालन राजस्व अमले द्वारा नही किया जा रहा है। इसी तरह आम निस्तारी तालाबो के सम्बंध में धारा 32 तथा 251 म0प्र0भू राजस्व संहिता के तहत अन्र्तनिहित शक्तियों का प्रयोग करते हुये आम निस्तारी तालाबो को शासकीय दर्ज करके मुक्त कराने का आदेश दिया गया है। इस सम्बंध में श्रण्स्ण्श्रण् 2019 (द्वितीय पार्ट) केश नं0 122 आदेश दिनांक 20.02.2019 अवलोकनीय है। माननीय उच्चतम् न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 4787/2001 हिंचलाला तिवारी बनाम कमला देवी में पारित आदेश दिनांक 25.07.2001 में स्पष्ट रूप से निर्देशित किया गया है कि जंगल, तालाब, पोखर, पठार तथा पहाड़ आदि समाज की बहुमूल्य धरोहर है और उनका अनुरक्षण पर्यावरण संतुलन बनाये रखने हेतु आवश्यक है एवं उक्त आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि तालाबो के समतलीकरण के परिणाम स्वरूप किये गये आवासीय पट्टो को निरस्त किये जाने एवं निर्मित भवन व अतिक्रमण 06 माह के भीतर ध्वस्त करके तालाब की भूमि का कब्जा गाॅव सभा को दिये जाने का आदेश देते हुये निर्धारित अवधि के भीतर ऐसा न करने पर जिला प्रशासन को उक्त आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिये गये है। उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुये दोनो तालाबो में किये जा रहे अवैध अतिक्रमण व स्वरूप परिवर्तन कर दिये जाने से पर्यावरण संतुलन बनाये रखने में कठिनाई होगी वहां जल संरक्षण व पेयजल आदि जैसी विकट समस्यायें जन्म लेगी तथा जल स्त्रोत व भू-जल स्तर पर भी प्रभाव पड़ेगा। जिससे मानव एवं पशु जीवन व पर्यावरण प्रभावित होगा।                                                              










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