परमार्थ निकेतन में स्वच्छ गंगा मिशन व जैव विविधता संरक्षण कार्यशाला का आयोजन

डाॅ साध्वी भगवती सरस्वती जी ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यशाला का उद्घाटन किया

उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड  और पश्चिम बंगाल, पांच राज्यों के 50 से अधिक गंगा प्रहरियों ने सहभाग किया

भारतीय वन्य जीव संस्थान द्वारा आठ दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन

गंगा प्रहरियों को स्वच्छ गंगा मिशन एवं जैव विविधत हेतु प्रशिक्षित करना

KKK न्यूज रिपोर्टर सुभाष चंद्र पटेल ऋषिकेश, 11 फरवरी। परमार्थ निकेतन में भारतीय वन्य जीव संस्थान के तत्वाधान में आठ दिवसीय स्वच्छ गंगा मिशन व जैव विविधता संरक्षण परियोजना कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पांच राज्यों के 50 से अधिक गंगा पहरियों ने सहभाग किया। गंगा प्रहरियों को स्वच्छ गंगा मिशन एवं जैव विविधत हेतु प्रशिक्षित किया जा रहा है।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य गंगा जिन प्रदेशोें से होकर गुजरती है वहां के गंगा प्रहरियों को स्वच्छ गंगा मिशन और जैव विविधता के लिये प्रशिक्षित करना ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर गंगा एवं जैव विविधता से सम्बंधित गतिविधियों का नेतृत्व कर सके। विशेष रूप से स्वच्छता और वृक्षारोपण अभियान का संचालन सुचारू रूप से किया जा सके। राज्यों के वन विभाग के साथ गंगा प्रहरी मिलकर कार्य करे, गंगा नदी की विभिन्न जलीय प्रजातियों की जनगणना करना, जैव विविधता के लिये स्कूल के बच्चों को प्रेरित करना।

इस परियोजना के तहत गंगा और उसकी चयनित सहायक नदियों को स्वच्छ और निर्मल करने के लिये स्पीयरहेड्स का चयन किया गया है। गंगा संरक्षण गतिविधियों से संबंधित तकनीकी मुद्दों पर विस्तृत जानकारी प्रतिभागियों के साथ साझा की जा रही है कि वे किस प्रकार पुनर्वास एवं बचाव, जैव विविधता संरक्षण, फोरेंसिक तकनीक, जल परिक्षण तकनीक, सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण तकनीक, आजीविका विकास और ग्राम स्तर पर जैव विविधता संवेदनशील माइक्रोप्लानिंग की प्रक्रियाओं पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को प्रासंगिक आईटी कौशल और विभिन्न अनुप्रयोगों जैसे भुवन गंगा ऐप, एक्वालाइफ डेटा ऐप और गांवों के लिये डिजिटल माइक्रो प्लानिंग का उपयोग किया गया है। ये आईटी आधारित एप्लिकेशन गंगा प्रहरियों को अपने आसपास के क्षेत्र में गंगा नदी से सम्बंधित मुद्दों की निगरानी और रिपोर्ट करने में सक्षम बनायेंगे। यह अतंतः जमीनी स्तर से संरक्षण गतिविधियों में योगदान करने वाले लोगों के लिये उचित नीतियों को तैयार करने में सरकार को सुविधा प्रदान करेगा।

जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिये कि ’जल है तो कल है’ ’जल ही जीवन है’ इसके लिये जमीनी स्तर पर कार्य करना होगा। उन्होने कहा कि गंगा केवल हमारी आस्था का केन्द्र नहीं है बल्कि 50 करोड़ लोगों की आजीविका गंगा के जल पर निर्भर है। 25 करोड लोग तो पूर्ण रूप से केवल गंगा जल पर आश्रित है, फिर भी करोडो लीटर प्रदूषित जल गंगा में प्रवाहित किया जाता है। घरों, शहरों, उद्योगों, एवं कृषि से निकलने वाला अपशिष्ट जल बिना पुर्ननवीनीकरण एवं उपचारित किये विशाल मात्रा में गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है जो हमारे पर्यावरण को प्रदूषित करता है। इससे जल के साथ-साथ प्रकृति के मुल्यवान पोषक तत्व भी नष्ट हो रहे है। अनुउपचारित जल से पेचिस, टायफाइड, पोलियो जैसी बीमारियों में वृद्धि हो रही है। स्वच्छ जल, स्वच्छता एवं स्वच्छता सुविधाओं की आवश्यकता मनुष्य के साथ जलीय प्राणियों एवं पर्यावरण को भी है अतः जल संरक्षण एवं जल के पुर्ननवीनीकरण के लिये प्रयास भी युद्ध स्तर करना होगा। साथ ही इसके लिये जनमानस को भी जागृत किया जाने की जरूरत है। साध्वी जी ने कहा कि भारतीय वन्य जीव संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यशाला के माध्यम से गंगा प्रहरी यहां से प्रशिक्षण लेकर उसे जमीनी स्तर पर लागू करे तो हमें इसके विलक्षण परिणाम प्राप्त हो सकते है।

परमार्थ गंगा तट पर पांच राज्यों से आये सभी गंगा प्रहरी, जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी, स्वामिनी आदित्यनन्दा सरस्वती जी, भारतीय वन्य जीव संस्थान के पदाधिकारी डाॅ एस ए हुसैन, वैज्ञानिक और परियोजना अन्वेषक डाॅ रूचि बडोला, वैज्ञानिक और परियोजना अन्वेषक डाॅ संगीता एंगोम, परियोजना वैज्ञानिक, प्रशिक्षण समन्वयक और परियोजना अनुसंधान अध्यक्ष सुश्री मोनिका महरालु, सुश्री प्रीति शुक्ला, श्री केशव कुमार, श्री रतीश सिंह, श्री आकाश मोहन रावत और परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने सहभाग किया।

गंगा प्रहरी प्रतिभागी और भारतीय वन्य जीव संस्थान के पदाधिकारियों ने परमार्थ गंगा आरती में सहभाग किया।

साध्वी भगवती सरस्वती जी ने सभी को एकल उपयोग प्लास्टिक का उपयोग न करने का संकल्प कराते हुये कहा कि प्लास्टिक जलीय जीवन, मानव जीवन और मृदा के लिये अत्यंत खतरनाक है इसका उपयोग कम से कम किया जाना चाहिये तभी हम अपनी प्रकृति, पर्यावरण और परिवारों को सुरक्षित रख सकते है।






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