शान्ति के लिये संवाद, दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया

परमार्थ निकेतन में चार दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन का आयोजन

स्वच्छ जल और शुद्ध वायु ही है शान्तियुक्त जीवन का आधार-स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश, 15 फरवरी। परमार्थ निकेतन में चार दिवसीय ’’शान्ति के लिये संवाद’’ दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया अन्तर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन का आयोजन परमार्थ निकेतन, ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस, केएआईसीआईआईडी (किंग अब्दुल्ला बिन अब्दुलअजीज इंटरनेशनल डायलाॅग), डाॅयलाग फाॅर पीस के संयुक्त तत्वाधान में किया गया।

परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी और अन्य पदाधिकारियों ने दीप प्रज्वलित कर शान्ति के लिये संवाद अन्तर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन का उद्घाटन किया।

’शान्ति के लिये संवाद’ अन्तर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में आये वैश्विक प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों और सैकड़ों प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुये स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि इस शिखर सम्मेलन के माध्यम से दुनिया के राष्ट्रों के मध्य आपसी बन्धुत्व और प्रगाढ़ होंगे। हमें अपने आपसी रिश्तों को मधुरता, शान्ति और सौहार्द्रता से परिपूर्ण करना होगा। भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में से एक है और दुनिया के अन्य देशों को इससे काफी उम्मीद है। उन्होने कहा मुझे भरोसा है कि हम सभी के समेकित प्रयासों से दुनिया के अन्य राष्ट्रों के आपसी सम्बंध शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व के साथ आगे बढ़ते रहेंगे। साथ ही कहा कि वर्तमान समय में भारत के पास एक कुशल नेतृत्व करने वाली सरकार है जो कि वैश्विक स्तर की समस्याओं का समाधान बेहतर ढंग से कर सकती है। स्वामी जी ने कहा कि अब समय आ गया है कि वैश्विक स्तर पर शान्ति की स्थापना के लिये सभी राष्ट्रों को मिलकर जलवायु परिवर्तन, आंतकवाद, कुपोषण, गरीबी उन्नमूलन, मानवाधिकार जैसे अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों के समाधान के साथ वैश्विक समृिद्ध के लिये कार्य करना होगा।’

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में देखा जाये तो विश्व स्तर जल का घटता स्तर और दूसरा चारांे ओर बढ़ता आतंकवाद प्रमुख समस्यायें है। हम सभी को सर्वप्रथम जल समस्या के विषय में विचार करना होगा क्यांेकि यह एक वैश्विक भयावह समस्या है। जल समस्या एक वैश्विक समस्या है और यह किसी युद्ध से कम नहीं है। इससे निजात पाने के लिये जल के संरक्षण के साथ जल का पुनर्चक्रण नितांत आवश्यक है। वैज्ञानिकों ने बताया की भारत में कुल ऊर्जा का 15.2 प्रतिशत ही नवीकरणीय ऊर्जा का योगदान है इसी प्रकार अपशिष्ट जल का केवल 2.2 प्रतिशत पुनर्नवीनीकरण किया जा रहा है इसलिये हमें जल के पुनर्चक्रण एवं पुनर्नवीनीकरण के लिये क्रान्ति की तरह कार्य करना होगा। जल वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि दुनिया में वर्ष 2040 तक पीने योग्य जल केवल आधा ही बचा रहेगा वास्तव में यह चिंतन का विषय है और इस पर सामाधान होना चाहिये।

जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि हम वैश्विक शान्ति की कल्पना तभी कर सकते है जब हमारे आस-पास का वातावरण शुद्ध और प्रदूषण मुक्त हो। वर्तमान समय में प्रकृति, पर्यावरण और जल का संरक्षण ही हमें और हमारी भावी पीढ़ी को जीवन प्रदान कर सकता है। प्राकृतिक संपदा का इस प्रकार से दोहन न हो कि आने वाले समय में भावी पीढ़ियों को जीवन जीने के लिये ही संघर्ष करना पड़े। साध्वी जी ने कहा कि हम सभी मजबूत इरादों के साथ हरित विकास की ओर बढ़े तो सकारात्मक परिणाम निश्चित रूप से प्राप्त होंगे।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में सभी ने मिलकर वैश्विक स्तर पर शान्ति की स्थापना के लिये विश्व ग्लोब का जलाभिषेक किया। तत्पश्चात दिव्य गंगा आरती एवं सत्संग में सहभाग किया। स्वामी जी ने गंगा आरती में उपस्थित सभी को प्रकृति और पर्यावरण के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करने का संकल्प कराया।




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