सियासी धमा चौकड़ी के बीच पीस रहा आम जनमानस मूल मुद्दों से हटि सरकारें सियासी नूरा कुश्ती चल रही पूरा लेख पढ़ने के लिए लिंक पर जाएं

गरीबी की क्या खूब हंसी उड़ाई  जाती है,एक रोटी देकर सौ तस्वीर खिचाई जाती हैं।


इनसे उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले,ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले।

इस समय मध्य प्रदेश में राजनीतिक उठापटक का माहौल चल रहा है सीयासी उथल-पुथल के बीच आम जनमानस के सारे मुद्दे गायब हो चुके हैं ।

ना नौकरी ना रोजगार ना आम जनमानस के मूल मुद्दे बस इसकी सरकार उसकी सरकार ये नेता वह नेता ना पार्टी रही ना विचारधारा अपने सियासी फायदे के लिए आम जनमानस के मतों का दुरुपयोग होता नजर आ रहा है। आम जनमानस चाहता है देश का प्रदेश का विकास उनके घर देश की जन कल्याणकारी योजनाओं का पहुंचना लेकिन योजनाओं का पहुंचना तो दूर की बात सब वचन पत्र घोषणा पत्र में ही गुम होता नजर आ रहा है । ना किसानों की कर्ज माफी ना गरीबों के उत्थान की योजनाएं ना कहीं नजर आ रहा है बेरोजगारों का रोजगार मजदूर वर्ग दो दो पैसे के लिए चिंतित दिखाई दे रहा है।वही रोज चल रहे सियासी नूरा कुश्ती मैं व्यस्त नजर आ रहे राजनीतिक कार्यकर्ता और सियासी पार्टियां रोज नया बदलाव नित नई घोषणाएं आम जनमानस से कोसों दूर दिख रहे सियासी पार्टियों के मुद्दे ज्वलंत मुद्दा बेरोजगारी नौकरी किसानों की समस्याएं गरीबों के उत्थान की व्यवस्था और सरकारों के घोषणा पत्र वचन पत्र पर काम ना होने से असंतुष्ट जनमानस कांग्रेस ने किसानों के कर्ज माफी का बीड़ा उठाया किसानों की कर्ज माफी अब तक पूरी तरह नहीं हो पाई वहीं किसानों के कर्ज़ों की रिकवरी लगातार चल रही है। किसानों के खातों पर जो भी पैसा आता है बैंक कर्मचारियों से जप्त कर लेते हैं वही बैंक कर्मचारियों का कहना है कि जब आपका कर्ज माफी का पैसा राज्य सरकार डालेगी आपको पुनः पैसे वापस किए जाएंगे समर्थन मूल्य न मिलने से भी किसान परेशान नज़र आ रहे हैं व्यवसायिक व्यवसाय में नित नए प्रयोजन से परेशान दिख रहे हैं वही ओलावृष्टि बिन समय की बरसात से भी किसान प्रभावित हो रहे हैं।

रोजगार के साधन बनने को तैयार नहीं नौजवान युवाओं के जीवन से खिलवाड़ चल रहा है। शिक्षा का स्तर स्वास्थ्य व्यवस्था बिजली की व्यवस्था पानी की समस्या फिलहाल पुरानी स्थिति पर है।

स्कूलों में अब तक शिक्षक नहीं बढ़ाए गए वही भ्रष्टाचार जैसे को तैसा फल फूल रहा है ।

देश के अंदर की अव्यवस्था चरम पर है नित नए आंदोलन तैयार हो रहे हैं ।

देश को सही दिशा में लाने के लिए निश्चित तौर पर बड़े बदलाव की आवश्यकता है ।

अब तो आमजन पार्टी देख कर भी मतदान नहीं करेगी क्योंकि सियासी उलटफेर ने उनके मनोबल को भी कुचल कर रख दिया है।

राजनीतिक पार्टियां जब तक आम जनमानस के उत्थान के लिए कार्य नहीं करेंगे तब तक देश का विकास असंभव है लगातार बैंक मर्ज होती जा रही हैं ।

और कर्ज तले दबे जा रहे आम जनमानस गांव क्षेत्रों में भी घुस घुस कर ब्याज में पैसा बांट रहे प्राइवेट बैंक भारी मात्रा में ब्याज पर पैसे लेकर ग्रामीण अपना घर चला रहे हैं।

इसलिए डाटा के अनुसार अगर आज की जानकारी अपडेट की जाए हर व्यक्ति कर्ज में दिखाई दे रहा है समय को बदलना बड़ी चुनौती है देश के व्यवस्थाओं को लेकर सरकारों को मूल मुद्दों में आना पड़ेगा देश की व्यवस्था लगातार खराब हो रही है।

वही देश को तोड़ने के लिए राजनीति धार्मिक आधार पर कार्य करने की कोशिश कर रही है ।

यह भी एक गंभीर मुद्दा आगे चलकर बनने वाला है सत्ताधारी पार्टियों को आत्ममंथन कर गरीबों के उत्थान के लिए मजदूरों के उत्थान के लिए व्यापार उद्योग और व्यवसाय क्रियाकलाप को बढ़ाने के लिए जमीनी स्तर का जायजा लेकर काम करना चाहिए सबसे बड़ा मुद्दा इस वक्त पूरे देश में रोजगार ही है।

क्योंकि जब तक गरीबों के बेरोजगारों के और मध्यमवर्गीय व्यवसायियों के उत्थान के लिए सरकार कार्य नहीं करेगी तब तक हर योजनाएं अधूरी है ।

सियासत के खेल में कुर्सी की भूख होती है,

इसलिए तो हिन्दू मुसलमान में डाली फूट होती है।

सियासत अपना रुख अब इतना कड़ा मत कर,

इंसानियत को अब भगवा और हरा मत कर।

लेखक -

अब्दुल कादिर खान कलयुग की कलम 

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