कोरोना से देष को बचाने समूचे भारतवर्ष में आयंबिल तप की लड़ी चला रहा जैन समाज जैन आचार्य व संतो द्वारा दी जा रही प्रेरणा, घर में बैठकर तप कर रहे समाज के सदस्य

कलयुग की कलम 

खिरकिया  । असाध्य एवं गंभीर बिमारियों से मुक्ति के लिए जैन श्वेताम्बर समाज द्वारा समूचे भारत वर्ष में आयंबिल तप किए जाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि देषभर में आए इस संकट से निजात पायी जा सके। समाज द्वारा समूचे देष मंे अपने अपने घरो में रहकर यह तप किए जाने की प्रेरणा दी जा रही है। वर्तमान में कोरोना जैसी महामारी के संकट को मिटाने के लिए समाज द्वारा इस पर जोर दिया जा रहा है। तप में शरीर स्वस्थ्य रहता है, वहीं इससे आषक्ति को दूर करता है। इस तप को गंभीर बिमारियों से सुरक्षा कवच बताया जाता है। जिसके लिए समाज का एक राष्ट्रीय गु्रप संपूर्ण आचार्यो को नमन के द्वारा आयंबिल अधिक से अधिक आयंबिल तप किए जाने के लिए लड़ी प्रारंभ की है।

संपूर्ण भारत में जहां जहां भी जैन आचार्य या संत विराजमान है, वहां पर संतो द्वारा अधिक से अधिक आयंबिल तप किए जाने की प्रेरणा दी जा रही है, नगर में विराजित विनयमुनि मसा, मधुरमुनि मसा आदि ठाणा 3 द्वारा भी अधिक से अधिक आयंबिल तप किए जाने की प्रेरणा दी जा रही है। समाज द्वारा इस तप को लड़ी के रूप में चलाया जा रहा है। नगर में भी जैन समाज के सदस्यो द्वारा आयंबिल तप किए जा रहे है। जैन शास्त्रो में ऐसी मान्यता है कि द्वारका नगरी में आयंबिल तप का पालन हुआ तब तक नगरी सुरक्षित रही है, जैसे ही तप की लड़ी बंद हुई, नगरी का विनाष हो गया। इसलिए इस तप का पालन करके इस असाध्य बिमारी से देषवासियों को बचाने के लिए यह धार्मिक अनुष्ठान समाज द्वारा किया जा रहा है।

क्या है आयंबिल तप

आयंबिल तप में उबला या पकाया हुआ स्वादरहित भोजन एक आसन पर बैठकर एक ही बार ग्रहण किया जाता है। आयंबिल तप के भोजन में शक्कर घी, मक्खन, मलाई, दूध, दही, सब्जी, मेवाफल आदि स्वादिष्ट भोजन का त्याग करना होता है। कुछ लोग नमक के पानी का भी त्याग करते हैं। सूर्यास्त तक धोबन या गर्म पानी का भी सेवन करते है।

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