भगवान विष्णु के छठे अवतार महावीर परशुराम की गाथा 

हस्तक्षेप / दीपक कुमार त्यागी

स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

आज देश जगत के पालनहार भगवान विष्णु जी के छठे अवतार  भगवान परशुराम जी के जन्मोत्सव का पावन पर्व मना रहा है। हमारे वैदिक सनातन धर्म की धार्मिक मान्यताओं व पौराणिक वृत्तान्तों के अनुसार भृगुकुल तिलक, अजर-अमर, अविनाशी, विश्व के अष्ट चिरंजीवियों में सम्मिलित, शस्त्र व शास्त्र के महान ज्ञाता परम वीर भगवान परशुराम जी का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया के पावन दिन माता रेणुका के गर्भ से हुआ था। भगवान परशुराम जी राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय सप्तऋषि महर्षि जमदग्नि के पाँचवें पुत्र थे। भगवान परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि वेद-शास्त्रों के महान ज्ञाता थे और वो सप्तऋषियों में से एक थे। हमारे शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम अजर-अमर हैं और वह किसी समाज विशेष के आदर्श ना होकर, बल्कि वो संपूर्ण वैदिक सनातन धर्म को मानने वालें सभी हिन्दूओं के आदर्श हैं। उनको अष्ट चिरंजीवियों में से एक चिरंजीवी माना गया हैं, उनका उल्लेख हमें रामायण में माता सीता के स्वंयवर के समय भगवान श्रीराम के काल में भी मिलता है, तो उनका उल्लेख हमें महाभारत के भगवान श्रीकृष्ण के काल में भी मिलता है। उन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था। श्रीमद्भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा कल्कि पुराण में भी भगवान परशुराम जी का उल्लेख मिलता है। धर्म के ज्ञाता कहते हैं कि वे कलिकाल के अंत में उपस्थित होंगे, ऐसी धार्मिक मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि वे कल्प के अंत तक धरती पर ही तपस्यारत रहेंगे। पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरि पर्वत पर भगवान परशुराम जी की तपोस्थली है और वह उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए तपस्यारत होने के लिए चले गए।

भगवान परशुराम जी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। वह भगवान शिव के अनन्य परम भक्त हैं। इन्हें भगवान शिव से ही विशेष परशु प्राप्त हुआ था। जिसके चलते इनका नाम परशुराम हो गया। वैसे इनका नाम तो राम था, किन्तु शंकर के द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण इनका नाम परशुराम पड़ गया था। परशुराम भगवान विष्णु के दस अंशावतार में से छठे अवतार थे, जो वामन अवतार एवं राम के मध्य में आता है। सप्तऋषि महर्षि जमदग्नि के पुत्र होने के कारण इन्हें 'जामदग्न्य' भी कहा जाता हैं। भृगु कुल में उत्पन्न परशुराम जी सदैव अपने गुरुजनों तथा माता-पिता की आज्ञा का पालन हर हाल में करते थे। भगवान परशुराम के कथनानुसार राजा का कर्तव्य होता है वैदिक सनातन धर्म के अनुसार राजधर्म का पालन करते हुए प्रजा के हित में कार्य करे, न कि प्रजा से अपनी आज्ञा का पालन करवाए और राजा उसके अधिकारों पर अंकुश लगाए।

धरती को पाप से मुक्त करने के लिए अवतार :-

जब परशुराम का धरती पर जन्म हुआ तब उस समय दुष्ट व राक्षसी प्रवृत्ति के बहुत सारे राजाओं का पृथ्वी पर बोलबाला था। उन्हीं में से एक राजा ने उनके पिता महर्षि जमदग्नि को मार दिया था। इससे परशुराम बहुत कुपित हुए और उन्होंने उस दुष्ट राजा का वध किया। उन्होंने राक्षसी प्रवृत्ति के सभी राजाओं का वध करके पृथ्वीवासियों को भयमुक्त किया था। कुछ कथाओं के आनुसार परशुराम ने पृथ्वी पर क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। उस समय के क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से व पापियों से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए ही भगवान परशुराम का जन्म हुआ था।

भगवान परशुराम जन्म कथा :-

भृगु ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधू से वर माँगने को कहा। उनकी पुत्रवधू सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र की कामना की। भृगु ने उन दोनों को 'चरु' भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेड़ तथा उसकी माता पीपल के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु ऋषि पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार करने वाला होगा। सत्यवती के बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा, किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा। सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए, जो क्रमशः रुमण्वान, सुषेण, वसु, विश्वावसु तथा पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था और वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था। 

परशुराम की गाथाएं :-

भगवान परशुराम की शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया ।

परशुराम गुरुजनों, माता-पिता की आज्ञा का पालन हर हाल में करते थे। एकबार जमदग्नि मुनि ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को माँ रेणुका की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। फिर उन्होंने परशुराम को आदेश दिया कि वो अपनी माँ की हत्या करें। आज्ञाकारी परशुराम ने तुरन्त पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ऋषि ने प्रसन्न होकर परशुराम से वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने सबसे पहले वर से माँ का पुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों को क्षमा कर देने के लिए कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम को आशीर्वाद देते हुए  कहा कि वो सदा अजर-अमर रहेगा।

एक दूसरी कथा के अनुसार ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। तब सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। इस युद्ध में उन्होंने सहस्त्रार्जुन की भुजाएं और मस्तक काट दिया था।

ऐसा भी कहा जाता है कि उस काल में हैहयवंशीय क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार था। भार्गव और हैहयवंशियों की पुरानी दुश्मनी चली आ रही थी। हैहयवंशियों का राजा सहस्रबाहु अर्जुन भार्गव आश्रमों के ऋषियों को सताया करता था। एक समय सहस्रबाहु के पुत्रों ने जमदग्नि ऋषि के आश्रम की कामधेनु गाय को लेने तथा परशुराम से बदला लेने की भावना से परशुराम के पिता का वध कर दिया। जब परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखी हुए और क्रोधवश उन्होंने हैहयवंशीय क्षत्रियों की वंश-बेल का विनाश करने की कसम खाई। 

पिता के वियोग में भगवान परशुराम की माता चिता पर सती हो गयीं। पिता के शरीर पर 21 घाव को देखकर भगवान परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वह इस धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे। इसके बाद पूरे 21 बार उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। इसी कसम के तहत उन्होंने इस वंश के लोगों से बार-बार युद्ध कर उनका 21बार समूल नाश कर दिया था। तभी से शायद यह भ्रम फैल गया कि भगवान परशुराम ने धरती पर से क्षत्रियों का समूल नाश कर दिया था, लेकिन धर्म के ज्ञाता कहते है कि परशुराम ने महिलाओं का वध नहीं किया था जिससे बाद में वंश चलता रहा। उन्होंने संमत पंचक क्षेत्र (कुरुक्षेत्र) में क्षत्रियों के रुधिर से पाँच कुंड भर दिये थे। रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक ऋषि साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों को दक्षिणा में समस्त पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये।

भगवान गणेश और परशुराम के बीच युद्ध- ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार भगवान परशुराम अपने इष्ट भगवान शंकर के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। वहां भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान थे और वह माता पार्वती को राम-कथा सुना रहे थे। कथा में बाधा उत्पन्न न हो इसके लिए उन्होंने अपना दिव्य त्रिशूल गणेश जी को प्रदान कर दरवाजे पर यह कहकर खड़ा कर दिया था कि किसी को भी वहां न आने दे।

लेकिन जब भगवान परशुराम  कैलाश पहुंचकर सीधे भगवान शंकर के दर्शन के लिए कैलाश के द्वार में प्रवेश करने लगे। तो द्वार पर नंदी, शृंग आदि शिवगणों से उनकी भेंट हुई। भगवान परशुराम ने उनसे भगवान शिव के बारे में पूछा कि इस समय वे कहां हैं? इस पर नंदी ने कहा कि इस बात की उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि भगवान शिव कहां हैं। इस पर भगवान परशुराम ने नंदी आदि शिवगणों पर गुस्सा करते हुए कहा कि तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम्हारे आराध्य देव कहां हैं। ऐसे में तुम शिवगण कहलाने के लायक ही नहीं हो।

परशुराम जी ने शिवगणों पर क्रोध किया और खुद भगवान शिव को ढूंढने कैलाश में प्रवेश कर गए। बहुत ढूंढने के बाद भी उन्हें भगवान शंकर कहीं नहीं मिले। अंत में एक घर दिखाई दिया, जहां द्वार पर एक बालक पहरा दे रहा था। भगवान परशुराम उस बालक के पास पहुंचे और वहीं से द्वार में प्रवेश करने लगे। तब भगवान गणेश जी ने उन्हें वहीं रोक दिया। इस पर परशुराम जी ने कहा तुम कौन हो जो मुझे इस तरह यहां रोकने का प्रयास कर रहे हो? इस पर गणेश जी ने कहा आप कौन हैं जो इस तरह अंतःपुर में बिना अनुमति के प्रवेश कर रहे हैं।

इतने में नंदी आदि शिवगण वहां आए और भगवान परशुराम को बताया यह गजमुख वाला बच्चा माता पार्वती के पुत्र गणेश जी हैं। साथ ही गणेश जी से कहा कि ये परशुधारी भगवान शिव के अनन्य भक्त परशुराम हैं। भगवान परशुराम ने कहा कि ये विचित्र बालक, जिसका मुंह गज का है और बाकी का शरीर इंसान का, कैसे माता पार्वती का पुत्र हो सकता है। तभी गणेश जी ने भगवान परशुराम का उपहास करते हुए कहा कि आप देखने में तो ब्राह्मण लगते हैं, लेकिन आपके हाथों में कमंडल की जगह यह परशु क्यों है? इस पर दोनों में बहस होती रही।

इसके बाद परशुराम भगवान शिव से मिलने के लिए उनके निवास स्थान पर अंदर जाने लगे। इतने में गणेश जी ने शिव जी द्वारा दिए गए त्रिशूल को परशुराम के सामने कर उन्हें युद्ध के लिए सावधान किया। उधर परशुराम जी ने भी अपना परशु तान कर चुनौती स्वीकार की। फिर दोनों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में परशुराम जी के फरसे द्वारा गणेश जी का एक दांत काट गया जिसके चलते उनका नाम एकदंत भी पड़ा।

परशुराम भीष्म युद्ध-

भगवान परशुराम वह शूरवीर थे, जिन्होंने एक स्त्री के अनुरोध पर स्त्री की रक्षा के लिए भीष्म के साथ इसलिए युद्ध किया था ताकि भीष्म खुद अपने द्वारा अपहरण करके लाई गई अम्बा (अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका वाली अम्बा) के साथ विवाह करें, पर वे भीष्म को आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा के चलते उन्हें डिगा नहीं सके। 

भगवान परशुराम जी शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।" वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया, ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है। यह भी कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण, गोवा एवं केरल का समावेश है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब उन्होंने पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर दी थी तो भगवान परशुराम ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरल तक समुद्र को पीछे धकेल दिया था, और अपनी तपस्या के लिए नई भूमि का निर्माण किया। इसी कारण से कोंकण, गोवा और केरल में भगवान परशुराम बहुत अधिक वंदनीय हैं। वो ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे, लेकिन वह अपने कर्म से एक महान क्षत्रिय योद्धा थे। भगवान परशुराम जी एक ऐसे सच्चे शूरवीर थे, जिनका जन्म पृथ्वी पर धर्म, संस्कृति, न्याय, सदाचार व सत्य की रक्षा करने के लिए हुआ था। आज जन्मोत्सव उन्हें हम सभी कोटि-कोटि नमन करते हैं। 

।। जय हिन्द जय भारत ।।

।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

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