मप्र के वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दिनेश निगम त्यागी की शिवराज मंत्रिमंडल पर तीखी टिप्पणी, आप भी पढिए...


 शिवराज पड़े कमजोर, गोपाल होने लगे निश्तेज

दिनेश निगम त्यागी

मुख्यमंत्री बन जाने के बावजूद क्या भाजपा में शिवराज सिंह चौहान की पकड़ कमजोर पड़ने लगी है? 'वक़्त है बदलाव' का नारा कांग्रेस ने दिया था, क्या इसे भाजपा में लागू करने की तैयारी है? मुख्यमंत्री शिवराज की 5 सदस्यीय जिस मिनी केबिनेट ने मंगलवार को शपथ ली है, इसे देख कर इस तरह के सवाल उठने लगे हैं। नए मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय एवम् जातीय संतुलन साधने की कोशिश हुई है लेकिन गुटीय संतुलन को नजरंदाज किया गया है। संकेत भाजपा में नए राजनीतिक समीकरण बनने की ओर इशारा कर रहे हैं। जैसे, भाजपा में पंद्रह साल से ताकतवर शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बन गए  लेकिन जिन पांच विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली, उनमें एक भी उनका अपना खास नहीं। कमल पटेल भाजपा में शिवराज सिंह के विरोधी के तौर पर उभरे थे। अवैध उत्खनन को लेकर उन्होंने शिवराज सरकार को कटघरे में खड़ा किया था, लेकिन वे मंत्री बनने में सफल रहे। सूत्र बताते हैं, पटेल सीधे मोदी-शाह के कहने पर मंत्री बने। दूसरा, गोपाल भार्गव नेता प्रतिपक्ष रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष मुख्यमंत्री पद का दावेदार होता है। भार्गव का पहले मंत्रिमंडल में न होना आश्चर्यचकित करने वाला है। लगता है गोपाल पार्टी में निश्तेज होने लगे हैं। इसे भाजपा के अंदर बन रहे नए राजनीतिक समीकरणों के तौर पर देखा जा रहा है। बहरहाल, शिवराज के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के 29 दिन बाद उनकी काम चलाऊ मिनी केबिनेट बन गई।  इसके साथ कई सवाल भी खड़े हो गए। अहम सवाल यह कि क्या भाजपा में अब दिग्गजों का दौर ख़तम हुआ और अब नए चेहरों के उदय की बारी है?

0 शिवराज के ये पांच रत्न बाहर....

मंत्रिमंडल विस्तार की जब भी चर्चा चली मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खास पांच पूर्व मंत्रियों के नाम चर्चा में जरूर रहे। ये पूर्व गृह व परिवहन मंत्री भूपेंद्र सिंह, पूर्व कृषि व सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन, पूर्व ऊर्जा एवं खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ला, पूर्व आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह तथा पूर्व पीएचई मंत्री रामपाल सिंह हैं। कल्पना भी नहीं की जा रही थी कि शिवराज का मंत्रिमंडल बनेगा और उसमें ये रत्न नहीं होंगे। पर ऐसा हो गया, पांच में से एक भी रत्न मंत्रिमंडल में जगह नहीं पा सका। जानकारों का कहना है, बागियों की वैशाखी के सहारे सरकार बनी है तो इस तरह के समझौते शिवराज को ही करना पड़ेंगे। इसे पार्टी में शिवराज की पकड़ कमजोर होने के तौर पर देखा जा रहा है। भूपेंद्र सिंह एवं गोपाल भार्गव सागर जिले में एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। खबर है, भूपेंद्र मंत्री नहीं बन सके तो गोपाल का भी पत्ता काट दिया गया। 

0 नरोत्तम, मीना को इसलिए मिला मौका....

मंत्रिमंडल में पहले नंबर पर शपथ लेने वाले नरोत्तम मिश्रा की गिनती पार्टी के कद्दावर नेताओं में होती है। कांग्रेस सरकार गिराकर भाजपा को सत्ता में लाने चलाए गए ‘आपरेशन लोटस’ अभियान में उनकी खास भूमिका रही है। कैलाश विजयवर्गीय की तरह नरोत्तम अमित शाह के खास हैं। उन्हें ईनाम मिलना ही था। पहले नंबर पर शपथ लेने के साथ वे सरकार में नंबर दो भी बन गए। साफ है दिग्गजों में उनका जलवा बरकरार रहेगा। उमरिया जिले की मीना सिंह आदिवासी महिला हैं। पांच चुनाव जीत चुकी हैं। इस अंचल के बिसाहूलाल सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए हैं  लेकिन मौका मीना को मिला। मीना सिंह को संघ एवं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा के कोटे का माना जाता है। इनकी सिफारिश पर वे मंत्री बनने में सफल रहीं। ऐसा कर भाजपा नेतृत्व ने संकेत देने की कोशिश की कि अब नए चेहरों को मौका देने का समय आ गया। अब वे ही मंत्री नहीं बनेंगे जो हमेशा बनते रहे।

0 ज्योतिरादित्य को करना पड़ा समझौता...

मंत्रिमंडल के गठन में शिवराज सिंह ने ही समझौता नहीं किया, कांग्रेस से 22 विधायक लेकर भाजपा में आने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी झटका लगा। उन्हें भी समझौता करना पड़ा। वे चाहते थे कि उनके कोटे के सभी मंत्रियों की पहली बार में ही शपथ हो। आखिर, उन्हें 6 माह के अंदर उप चुनाव का सामना करना है। सिंधिया की यह मंशा पूरी नहीं हो सकी। गौर करने वाली बात यह भी है कि उनके समर्थक सबसे ज्यादा विधायक चंबल-ग्वालियर अचंल से हैं। इस अंचल से उनका अपना एक भी विधायक मंत्री नहीं बन सका। सबसे ज्यादा 16 सीटों के लिए उप चुनाव इसी अंचल से होना है। इमरती देवी ने सोमवार को ही कहा था कि वे 24 अप्रैल को मंत्री बनने वाली हैं। मंत्री बनने से वंचित रह गए सिंधिया समर्थक निराश हैं, लेकिन कुछ कह पाने की स्थिति में भी नहीं हैं।

0 संतुलन साधने की हुई कोशिश....

मंत्रिमंडल भले छोटा बना है लेकिन इसमें काफी हद तक संतुलन साधने की कोशिश हुई है। जातीय संतुलन के लिहाज से सामान्य वर्ग के दो नरोत्तम मिश्रा व गोविन्द सिंह राजपूत, आदिवासी व महिला वर्ग से मीना सिंह, पिछड़ा से कमल पटेल एवं दलित वर्ग से तुलसी सिलावट को मंत्री बनाया गया है। अल्पसंख्यक वर्ग का कोई मंत्री नहीं है। क्षेत्रीय संतुलन के लिहाज से चंबल-ग्वालियर, बुंदेलखंड, मध्यभारत, मालवा एवं विंध्य अंचल को प्रतिनिधित्व मिला है। सिर्फ महाकौशल अंचल का कोई मंत्री नहीं है। गुटीय संतुलन जरूर नहीं साधा जा सका। गोपाल भार्गव मंत्री नहीं बनें, कई अन्य दिग्गजों के खास भी मंत्री बनने से वंचित रह गए। पार्टी ने समय रहते इस असंतुलन को दुरुस्त नहीं किया तो सरकार की राह निष्कंटक रख पाने में मुश्किल आ सकती है। माना जा रहा है कि इस असंतुलन को अगले विस्तार में सुधारने की कोशिश हो सकती है।


कलयुग की कलम 

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