उठेगी आवाज़ तो आएंगे कई पत्रकार और चैनल जद में नफ़रत फैलाने में अभद्र पत्रकारों का कम योगदान थोड़ी है। क्या नेशनल चैनल की भूमिका बदली है क्या कलम का सिपाही अपनी मूल भावनाओं से भटके हैं ? जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।


देश का चौथा स्तंभ गिरने की कार में है। चौथा स्तंभ अपनी जगह  मजबूत है लेकिन उसे बाकी रखने वाले अपनी मर्यादा भूल गए 

चौथा स्तंभ मजबूत है पर उसकी छवि और शुद्धता बाकी नहीं रही

क्या हुआ किसने दी इन्हें यह स्वतंत्रता कि अपनी मर्यादा लांग कर खुद कानून न्यायपालिका बन सजा सुना दें

चौथा स्तंभ तो माध्यम था गरीबों की आवाज़ और देश के प्रति सद्भाव को बनाने का इसे क्या हुआ

क्या पहले भी ऐसा हुआ है की पत्रकार अभद्र भाषा का उपयोग कर देश में उन्माद फैलाने का जरिया बने हो?

क्या अब चौथा स्तंभ ही फैसले सुनाएगा कटघरे में खड़ा करेगा इज्जत उछालेगा धर्मगुरुओं समाजसेवियों और विपक्ष पर बैठे राजनेताओं की

क्या आम जनमानस यही चाहते हैं की हर पहलू पर पत्रकार ही संज्ञान लेंगे और उसे तिल का ताड़ राई का पहाड़ बनाएंगे?

क्या जो सवाल विपक्ष से आमजन से और धर्म को धर्मीक गुरुओं से पूछे जा रहे हैं वो सरकार से पूछना चाहिए

क्या हर गलती की सजा आम जनमानस देश भक्त जाति धर्म के नाम पर आलोचना का शिकार आम जनमानस होगा

क्या पूरी जवाबदेही समाज धर्म व्यक्ति विशेष की होगी या सरकार और शासन प्रशासन की की भी कुछ जिम्मेदारी बनती है जवाबदेही बनती है?

क्या सरकार ने यह छूट दे रखी है कि पत्रकार किसी जाति धर्म विशेष को प्रताड़ित कर देश में बहिष्कार और दंगों की तैयारी करें?

क्या समाज को बांटने में इन चैनलों का और पत्रकारों का योगदान कम है।

आज देश जिन  राहों से गुजर रहा है जिस तरीके से देश के अंदर जाति धर्म समाज का दोहन हो रहा है इसमें पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान है।

किसी जाति धर्म समाज को प्रताड़ित करने और सवालों का उल्टा मतलब निकाल प्रचलित करने का सबसे बड़ा मापदंड देश के मीडिया तय कर रही है।

जज न्यायपालिका कोर्ट कानून शासन प्रशासन से ऊपर उठकर सजा सुनाने का काम यह टीवी चैनल कर रहे हैं यह देश के लिए खतरनाक है।

किसी के ऊपर आरोप लगना छोटी बात है लेकिन आरोप सिद्ध होना बड़ी बात है आरोप सिद्ध करने के लिए न्यायपालिका होती है लेकिन अब तो कुछ और ही चल रहा है आरोप लगाने वाले भी पत्रकार और आरोप सिद्ध करने वाले भी पत्रकार गिरफ्तारी करने वाले भी पत्रकार इज्जत उछालने वाले भी पत्रकार और देश को नीलाम करने वाले भी पत्रकार

देश की छवि दिन पे दिन धुर्वेत हो रही है लेकिन इन पत्रकारों के ऊपर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है।

आवाज उठाने पर देशद्रोह जैसे अल्फाज का इस्तेमाल किया जा रहा है।

देश की कानून व्यवस्था चरमरा रही है आम जनमानस की आवाज दबाई जा रही है।

धर्मगुरुओं के साथ अभद्रता का दौर चल रहा है पर किसी भी धर्म विशेष के अनुयाई को लेकर पत्रकारों की अभद्र शैली अशोभनीय है।

कुछ सालों से लगातार जितनी भी डेविडस टीवी चैनलों में हो रही हैं। 

अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज को गिराने के लिए और विपक्ष की भूमिका खराब करने के लिए चल रही है जो सवाल सत्ता पर विराजमान सरकार से होना चाहिए वह आम जनमानस और विपक्ष से किए जा रहे हैं यह चौथे स्तंभ की भूमिका पर काला धब्बा है।

आवश्यकता है कि  देश किसी भयानक विवाद का शिकार हो इसके पहले इन टीवी चैनलों का बहिष्कार कर दिया जाए

देश के मूल एकता और अखंडता और प्रभुता वासुदेव कुटुम पर सबसे बड़ा खतरा इन टीवी चैनलों से है।

इनकी अभद्र भाषाओं का शिकार आम जनमानस हो रहे हैं क्योंकि इनकी कट्टरपंथी सोच से लोगों के अंदर कट्टरपंथी विचारधारा तैयार हो रही है और इससे आम जनमानस मारा जाएगा

उन पर रोक लगाना अति आवश्यक है सरकार संज्ञान नहीं देती है तो आम जनमानस को सड़कों पर उतरकर इनका विरोध करना चाहिए

उसके साथ कानून का दरवाजा खटखटा इन्हें कठघरे पर खड़ा करना आवश्यक हो गया है‌।

इसके लिए हर जनमानस को चाहिए कि इनका बहिष्कार करें और आवाज उठाएं सोशल मीडिया एक माध्यम बनेगा इनके खिलाफ आंदोलन का मैं 

अब्दुल कादिर खान सभी देश प्रेमियों से इनका बहिष्कार और सोशल मीडिया में इनके खिलाफ आवाज उठाने का आगाज करता हूं 

लेखक -अब्दुल कादिर खान

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