आश्चर्य है या फ़क़त संयोग कि आज सुबह Netflix पर Pandemic फ़िल्म देखी और यह विश्वास मज़बूत होता रहा कि कलाएँ कुछ न कुछ भविष्यवाणियाँ किया करती हैं। 1918 की स्पेनिश फ़्लू या Great Influenza या Yellow fever  के माध्यम से आज कोरोना COVID-19 ने जो क़हर ढाया, उसकी बहुत पहले से चेतावनी। 

ताज्जुब यह कि इस फ़िल्म Pandemic में जिस लड़की या महिला सायरा मदाद ने भूमिका निभाई थी, वही सायरा मदाद आज अमेरिका के सबसे कोरोना प्रभावित महानगर न्यूयार्क में  इस महामारी से लोगों की जान बचाने के संघर्ष की अगुआई कर रही हैं। 

कल्पना और यथार्थ ऐसे ही परस्पर आवाजाही करते हैं। 

जब मैं जेएनयू में वरिष्ठ शोधछात्र के रूप में दाखिल हुआ, तब M.Phil. का प्रवेश नहीं हुआ था। उसी समय यह नियम आया और मुझे ‘Pre-Ph.D. नामक लघु-शोधकार्य करना पड़ा। निर्देशक थे -स्व. डॉ. नामवर सिंह। (साल था आपातकाल (१९७५) और मेरी उम्र थी २३ साल। जेएनयू आने से पहले ही अपने गृहराज्य मध्यप्रदेश के सागर विश्वविद्यालय से स्व. डॉ. शिवकुमार मिश्र के निर्देशन में ‘Special Dessertation’ कर चुका था। सागर वि.वि. स्वर्ण पदक मिल चुका था)

बहरहाल, नयी दिल्ली के जेएनयू में अब शोध का विषय था - ‘ साहित्यिक परिकल्पना और समाजशास्त्रीय परिकल्पना में संबंध और अंतर’। (Relations and Differences between Literary Imagination and Sociological Imagination.)

उस समय अंतर-अनुशासनिक अध्ययन की शुरूआत हुई थी। 

मैं पहला गिनीपिग था। 

बहरहाल, आप सब नागरिक दोस्त लोग जानते हैं कि ज़रा-सा पढ़ाकू हूँ। ... तो बहुत मेहनत और लगन से वह लघु-शोध पूरा हुआ। 

इसका सारांश यह कि योरोप में डरावने राष्ट्रवाद और जर्मनी तथा इटली जैसे देशों में फासीवाद/ नाज़ीवाद के आने और उसकी परिणतियों की परिकल्पना साहित्यकारों और कलाकारों ने राजनीतिक अटकलबाजों और समाजविज्ञानियों से डेढ़-दो दशक पहले ही कर ली थी। 

मेरे Research Supervisor मेरे गुरु, डॉ. नामवर सिंह, जिनसे मैं शायद सबसे कम मिला करता था, उन्होंने उसको A+ की रेटिंग दी और इतनी देर तक बोलते रहे कि मैं भावुकता में रुआँसा हो गया। 

अब इस सबका ज़िक्र बेमानी है। 

बहरहाल, आज सुबह Pandemic देखने के बाद अभी कुछ देर पहले Saira Madad को टीवी चैनल में बोलते हुए देख कर लगा कि विज्ञान और कलाएँ मानवता की सर्वोत्कृष्ट विशिष्टताएं हैं। 

समस्या राजनीति, अनैतिक सत्ताकामिता, पूँजी या दौलत का लोभ, परस्पर संदेह और हिंसक घृणाओं की क्षणभंगुर लेकिन प्रकृति और मनुष्य के लिए विनाशकारी ताक़तों से है। 

ऐसा लगा अभी।

(प्रख्यात कवि व कथाकार उदय प्रकाश के फेस बुक वाल से सभार)

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