नई दिल्ली। कोरोना-लॉकडाउन ने अखबारों भी को आर्थिक रूप से प्रभावित किया हाल में नुकसान 4500 करोड़ है और अगर यह जारी रहा तो नुकसान बढ़कर 15000 करोड़ हो जाएगा बता दे कि समाचार पत्रों के इस गंभीर मुद्दे को सबसे पहले जीएनएस ने उठाया था

      आईएनएस की मांग – अखबारी कागज पर 5% आयात शुल्क हटाया जाय, दो साल का कर माफ करें – सरकारी विज्ञापनों की दर 50% बढ़ाने और विज्ञापन बजट 200% बढ़ाने का अनुरोध

वर्तमान कोरोना लॉकडाउन के दौरान अखबार उद्योग भी देश के सबसे प्रभावित व्यवसायों में से एक है। पिछले दो महीनों में, भारत के समाचार पत्र उद्योग आईएनएस ने 4500 करोड़ रुपये से भी ज्यादा के नुकसान का अनुमान लगाया है। बता दे कि जानीमानी जीएनएस न्यूज एजेंसी ने सबसे पहले कोरोना संकट के कारण देश के छोटे-मोटे अखबारो पर आये आर्थिक संकट को लेकर 31 मार्च को एक विशेष रिपोर्ट जारी कर चिंता जताइ थी। भारतीय समाचार पत्र सोसायटी (INS), जो देश के लगभग 800 समाचार पत्रों का प्रतिनिधित्व करती है, ने कहा कि कोरोना संकट के कारण आर्थिक गतिविधि एक ठहराव में आ गई है। और अखबार इन्डस्ट्री भी उसमें शामिल है. क्योंकि सभी अखबारो का आधार विज्ञापन है और कोरोना लोकडाउन की वजह से विज्ञापन की आय पर प्रभाव पडा है। अगर सरकार की ओर से कोई मजबूत आर्थिक पैकेज या प्रोत्साहन नहीं मिलता है, तो अखबारों को हो रहे नुकसान का कडा कुछ समय में 12,000 रुपये से बढकर 15,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने की संभावना है। आईएनएस के अनुसार, सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की गई है ताकि न्यूज पेपर उद्योग को बचाया जा सके, जो 30 लाख लोगों को रोजगारी प्रदान करता है । सरकार से जो मांगे की गई है उसमें न्यूजप्रिंट पर 5 प्रतिशत आयात शुल्क हटाने और दो साल के लिए टैक्स छूट शामिल है।

विज्ञापन के बजट में 200 प्रतिशत की वृद्धि की जानी चाहिए। यह भी मांग की गई है कि विज्ञापनों का लंबित भुगतान तत्काल किया जाए।

 यहां यह ध्यान देने की जरूरत है कि अखबारों की लागत का एक बड़ा हिस्सा कच्चे माल के न्यूज प्रिंट, यानी अखबारी कागज पर खर्च किया जाता है। पिछले साल सरकार ने इस पर 10 फीसदी सीमा शुल्क लगाया था। इससे पहले यह ड्यूटी फ्री था। समाचार पत्रों सहित अन्य उद्योगों को दी जाने वाली रियायतों के बीच, आईएनएस ने कुछ और आवश्यकताओं पर जोर दिया है। आईएनएस ने राज्य सरकारों को यह भी सुझाव दिया है कि राज्य सरकारें भी स्थानिय समाचार पत्रों के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाना चाहिए। और वह इस दिशा में भी कार्य करे और विज्ञापन आदि दे।

आईएनएस के अध्यक्ष शैलेश गुप्ता ने कहा कि हाल के लोकडाउन की वजह से सभी अखबारों को नकदी की कमी और नुकसान के कारण वेतन और फेरीवाले का भुगतान करने में कठिनाई हो रही है। उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 8 से 10 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है और लगभग 20 लाख लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है।

आईएनएस ने सरकार से कहा है कि समाचार पत्र-अखबार संकट में हैं। कोरोना वायरस – कई छोटे और मध्यम समाचार पत्रों में गिरावट और अखबारी कागज पर कस्टम ड्यूटी के कारण बंद हो गए हैं, जबकि कई अखबारों ने अपने दैनिक पृष्ठों को कम कर दिया है। इस तथ्य के बावजूद कि समाचार पत्र उद्योग, जो कि लोकतंत्र में चौथी जागीर है, आवश्यक है, अधिकांश अखबार घाटे में चल रहे है। आईएनएस ने राज्य सरकारों और केंद्र सरकार का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया कि वर्तमान कोरोना महामारी संकट के दौरान, समाचार पत्र अपने कर्तव्य को मजबूती से निभा रहे हैं, संपादकीय, मुद्रण, उत्पादन लोग और वितरक खुद को जोखिम में डाल रहे हैं। ताकि कोरोना के संकट में लोग अपने घरों में सुरक्षित रहें और उनके पास सही और सटीक जानकारी हो। यह देखना जरूरी है कि केंद्र सरकार अखबार एसोसिएशन की मांग के बाद कितनी जल्दी काम करेगी। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस मुद्दे को पहली बार प्रसिद्धजानीमानी समाचार एजेंसी जीएनएस वायर सेवा ने समाचार पत्रों के हित में एक विशेष रिपोर्ट के माध्यम से यह मुद्दा उठाया था। आईएनएस ने तब सरकार को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें अखबारों का ध्यान उन कठिनाइयों की ओर आकर्षित किया गया था। अब जब अखबार एसोसिएशन ने नुकसान का आंकड़ा दिखाया है, तो सरकार को तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए और डीएवीपी को आदेश देना चाहिए कि वह बकाया बिलों का भुगतान शीघ्रता से करे और विज्ञापनों की दर में तेजी से वृद्धि करे।

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