किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि पी एन हक्सर के सुझाव पर फ़रवरी 1972 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थाई न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा की नियुक्ति को मंजूरी देने वाली प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को तीन साल बाद उसी न्यायाधीश के एक फैसले द्वारा रद्द कर दिया जायेगा । शायद यही जनतंत्र का सार है ।

25 जून भारतीय इतिहास में एक अमिट कलंकित छाप के रूप में दर्ज होकर रह गई है । जिसे आज भी कुछ राजनीतिक दलों द्वारा 45 सालों से हर साल धो - पोंछ कर जनता के सामने पेश कर उनके जख्मों को तरोताजा किया जा रहा है ।

25 जून 1975 को राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी । जो स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे ज्यादा विवादास्पद दिन बन कर रह गया है ।

18 मार्च 1975 श्रीमती इंदिरा गांधी की अग्नि परीक्षा का दिन था जिस दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की कोर्ट में श्रीमती गांधी का प्रतिपरीक्षण (Cross examination) किया गया । 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिन्हा द्वारा सुनाए गये फैसले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की कुर्सी को हिलाकर रख दिया । प्रधानमंत्री की कुर्सी को बचाये रखने के परिपेक्ष्य में 25 जून 1975 को देश में लगाये गए आपातकाल के रूप में जाना - माना जाता है ।

वर्ष 1971 का आम चुनाव । लोकसभा क्षेत्र रायबरेली (उत्तरप्रदेश) । उम्मीदवार श्रीमती इंदिरा गांधी, राजनारायण, स्वामी अद्वैतानन्द । मतदान 7 मार्च 1971 । मतगणना 9 मार्च 1971 । परिणाम घोषणा 10 मार्च 1971 । परिणाम श्रीमती इंदिरा गांधी 111810 मतों से विजयी घोषित की गई । श्रीमती इंदिरा को 183309 तथा राजनारायण को 71499 मत हासिल हुए वहीं तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी स्वामी अद्वैतानन्द रहे ।

चूंकि राजनारायण शुरू से ही चुनाव जीतने को लेकर आश्वस्त थे इसलिए वे अपनी पराजय को पचा नहीं पाए । अतः राजनारायण ने अंतिम तिथि 24 अप्रैल 1971 की रात को अतिरिक्त रजिस्ट्रार इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष याचिका प्रस्तुत की । याचिका जस्टिस डब्ल्यू ब्रूम के समक्ष सूचीबद्ध की गई । प्रारम्भिक सुनवाई पश्चात प्रतिवादीगण श्रीमती इंदिरा गांधी, स्वामी अद्वैतानन्द को नोटिस जारी किए जाने का निर्देश दिया गया । प्रतिवादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने लिखित जवाब प्रस्तुत कर दाखिल याचिका के सभी अभिकथनों को नकार दिया । कुछ पहलुओं पर मामला सुप्रीम कोर्ट भी गया । बहरहाल समय गुजरता गया । इस बीच दो न्यायाधीश सेवानिवृत्त भी हो गए । कोई खास प्रगति नहीं हुई । न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा के सामने 1974 में जब मामला आया तो उन्होंने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी ।

याचिकाकर्ता के वकील शांतिभूषण यह साबित करना चाहते थे कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने 27 दिसम्बर 1970 से (जब लोकसभा भंग हो गई थी) स्वयं को लोकसभा उम्मीदवार के रूप में जनता के सामने प्रगट कर रही थीं और उसी समय से यशपाल कपूर ने उनके लिए चुनाव कार्य करना शुरू कर दिया था । जबकि श्रीमती इंदिरा गांधी की तरफ से लगातार कहा जा रहा था कि वे 01 फ़रवरी 1971 को आधिकारिक रूप से लोकसभा उम्मीदवार बनी थीं ।

दोनों पक्षों द्वारा अलग - अलग तारीखों (27 दिसम्बर 1970 एवं 01 फरवरी 1971) पर इसलिए जोर दिया जा रहा था कि आमतौर पर एक व्यक्ति उम्मीदवार बनने के बाद ही लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत भृष्ट आचरण (CURRUPT PRACTICES) के आरोपों को आकर्षित कर सकता है । मतलब उम्मीदवार बनने के बाद ही वह जो कार्य करता है उसे उसके दोष के रूप में देखा जा सकता है । लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार एक व्यक्ति चुनावी उम्मीदवार तब बन जाता है जब वह खुद को उम्मीदवार के रूप में सामाजिक रूप से प्रगट करना शुरू कर देता है ।

कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न थे कि_ (1) क्या यशपाल कपूर की सेवाएं प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा ली गई जबकि वे राजपत्रित अधिकारी थे ? (2) क्या प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी 01 फ़रवरी  1971 से पहले किसी भी तारीख से, एक लोकसभा उम्मीदवार के रूप में खुद को सामाजिक रूप से प्रगट कर रही थी और हाँ तो किस तारीख से ? (3) क्या यशपाल कपूर 14 जनवरी 1971 और उसके बाद से और किस तारीख तक भारत सरकार की सेवा में बने रहे ?_इसी के आधार पर अंततः प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला आया ।

कोर्ट के सामने यशपाल कपूर की भारत सरकार में एक राजपत्रित अधिकारी के तौर पर सेवा कब ख़त्म हुई को तय करना सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था । क्योंकि यशपाल कपूर द्वारा कोर्ट में दलील दी गई कि उसने 13 जनवरी 1971 को अपना इस्तीफा दे दिया था जिसे प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी एन हक्सर द्वारा सीधे तौर पर मौखिक रूप से स्वीकार कर लिया गया था । कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि यशपाल कपूर का इस्तीफा राष्ट्रपति द्वारा आधिकारिक रूप से 25 जनवरी 1971 को स्वीकार किया गया परन्तु उसे 14 जनवरी से प्रभावी माना गया । जबकि आमतौर पर एक सरकारी कर्मचारी की सेवाओं को उस तिथि से समाप्त माना जाता है जिस तिथि से उचित प्राधिकारी द्वारा उसके त्यागपत्र को स्वीकार किया जाता है । कोर्ट को इस बात का भी परीक्षण करना महत्वपूर्ण था कि जब कपूर का इस्तीफा 25 जनवरी 1971 को स्वीकार किया गया है तो क्या वह 14 जनवरी 1971 से पूर्वव्यापी प्रभाव से प्रभावी होगा या नहीं । अंततः कोर्ट ने अभिनिर्णीत किया कि यशपाल कपूर के इस्तीफे को स्वीकार करने का आदेश 25 जनवरी 1971 को पारित किया गया था इसलिए यह माना जावेगा कि वे उस आदेश की तारीख तक एक राजपत्रित अधिकारी थे ।

हालांकि अदालती कार्यवाही के दौरान श्रीमती गांधी के वकीलों द्वारा लगातार यह दलील दी जाती रही कि यशपाल कपूर ने श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव अभियान का काम करने से पहले ही अपना इस्तीफा सौंप दिया था भले ही उसे औपचारिक रूप से बाद में स्वीकार किया गया है । उनकी तो यह भी दलील थी कि यशपाल कपूर के इस्तीफे की तारीख भी कोई मायने इसलिए नहीं रखती क्योंकि श्रीमती इंदिरा गांधी तो 01 फ़रवरी 1971 से पहले उम्मीदवार बनी ही नहीं थीं । इसलिए कानूनी शर्तों के तहत इस तारीख से पहले उन पर भृष्ट आचरण के आरोप लगाए ही नहीं जा सकते जबकि राजनारायण का कहना था कि श्रीमती इंदिरा गांधी 27 दिसम्बर 1970 से ही स्वयं को लोकसभा उम्मीदवार के रूप में जनता के सामने प्रगट कर रही थीं । इस पेचीदे सवाल को सुलझाना भी कोर्ट के लिए अहम था ।

प्रतिपरीक्षण (Cross Examination) में राजनारायण के वकील प्रशांतभूषण ने 29 दिसम्बर 1970 को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा एक संवाददाता सम्मेलन में एक रिपोर्टर द्वारा पूछे गए प्रश्न और श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा दिये गए उत्तर को आधार बनाकर कोर्ट में दलील दी कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग होने के दो दिन बाद 29 दिसम्बर 1970 को ही स्पष्ट कर दिया था कि वे लोकसभा उम्मीदवार हैं । दरअसल एक रिपोर्टर ने श्रीमती गांधी से पूछा था कि #कुछ घन्टे पहले विपक्षी नेताओं की एक बैठक हुई थी और उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री अपने निर्वाचन क्षेत्र को रायबरेली से बदल कर गुड़गांव कर रही हैं# इस पर श्रीमती गांधी ने रिपोर्टर को जोरदार जवाब देते हुए कहा था #नहीं, मैं ऐसा नहीं कर रही हूं# । श्रीमती इंदिरा गांधी ने रिपोर्टर को दिये गए जवाब का यह कहते हुए बचाव किया कि उनके बयान का यह मतलब था कि वह गुड़गांव से चुनाव नहीं लड़ेंगी । उनकी बात का यह मतलब नहीं था कि वह रायबरेली से चुनाव लड़ेंगी । श्रीमती इंदिरा गांधी अपने क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान पूरी तरह इस बात पर कायम रहीं कि उन्होंने 01 फरवरी 1971 से पहले अपने निर्वाचन क्षेत्र पर कोई निर्णय नहीं लिया था न ही खुद को लोकसभा के उम्मीदवार के तौर पर प्रगट किया था । इसलिए लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत भृष्ट आचरण का आरोप केवल 01 फ़रवरी 1971 के बाद उनके कृत्यों से संबंधित हो सकते हैं ।

12 जून 1975 को मामले में अंतिम निर्णय सुनाते हुए जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा राजनारायण की याचिका को 2 आधारों पर अनुमति दी । पहला यह कि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री सचिवालय में विशेष ड्यूटी पर एक अधिकारी यशपाल कपूर का इस्तेमाल किया था ताकि उनकी चुनावी सम्भावनाओं को आगे बढ़ाया जा सके । निर्णय में यह भी कहा गया कि यद्यपि कपूर ने 07 जनवरी 1971 से ही इंदिरा गांधी के लिए चुनावी कार्य शुरू कर दिया था और 13 जनवरी 1971 को अपना इस्तीफा दे दिया था लेकिन वह 25 जनवरी 1971 तक सरकारी सेवा में जारी रहे थे । इंदिरा गांधी ने 29 दिसम्बर 1970 से ही खुद को उम्मीदवार के रूप में प्रगट कर रही थी जिस दिन उन्होंने नई दिल्ली में एक समाचार सम्मेलन को संबोधित किया था और चुनाव के लिए खड़े होने के अपने फैसले की घोषणा की थी । दूसरा आधार यह था कि उन्होंने उत्तरप्रदेश में सरकारी अधिकारियों से सहायता प्राप्त की ताकि वे चुनावी रैलियों को संबोधित कर सकें । अधिकारियों ने लाऊड स्पीकर और बिजली की भी व्यवस्था की थी । न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत श्रीमती इंदिरा गांधी को 6 साल के लिए कोई भी चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया था । लेकिन उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए निर्णय पर 20 दिन की रोक लगा दी थी ।

कुछ अनछुए पहलू

निर्णय की गोपनीयता बनाये रखने के लिए जस्टिस सिन्हा को अच्छी खासी मस्कत करनी पड़ी । अपने स्टेनोग्राफर को छुट्टी पर भेज दिया । निर्णय का प्रभावी हिस्सा (Operative part) जस्टिस सिन्हा ने खुद अपने हाथों से लिखा ।

यदि कोर्ट ने 01 फ़रवरी 1971 के संबंध में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा दी गई दलील स्वीकार कर ली जाती तो वे यशपाल कपूर के इस्तेमाल के आरोपों से बच सकती थी ।

कुछ विशेषज्ञों द्वारा कोर्ट द्वारा अपने फैसले पर दिये गए स्टे को जस्टिस सिन्हा की चूक के रूप में देखा जाता है ।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांतभूषण ने अपनी किताब में लिखा है कि यदि न्यायमूर्ति सिन्हा न होते तो यह मामला हाईकोर्ट में वर्षों तक खिंच सकता था ।_●

पत्रकार स्वर्गीय कुलदीप नैयर के मुताबिक इमरजेंसी लगाने के बाद जस्टिस सिन्हा को परेशान किया गया ।_

आम धारणा है कि श्रीमती इंदिरा गांधी को अदालत के समक्ष साक्ष्य देने के लिए हाईकोर्ट द्वारा बुलाया गया था जबकि सत्यता यह है कि श्रीमती गांधी ने अपनी मर्जी से और अपने वकीलों की सलाह पर गवाह के रूप में पेश होने का फैसला किया था ।

अश्वनी बड़गैंया अधिवक्ता,  स्वतंत्र पत्रकार_

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