अश्वनी बड़गैंया अधिवक्ता,  स्वतंत्र पत्रकार

कलयुग की कलम 

जब देश में हर दिन एक नए रिकॉर्ड के साथ कोरोना पॉजिटिव की संख्या बढ़ रही हो । विश्वव्यापी महामारी कोविड 19 में जब भारत पांचवें पायदान को पार कर चौथे पायदान पर खड़े होने को तैयार हो रहा हो, देश में मेडिकल इमरजेंसी जैसे हालात बने हों तब देश की सरकार में भागीदार सबसे बड़ा राजनीतिक दल  भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिकता कोरोना पीड़ितों की देखभाल के स्थान पर चुनावी वैतरणी पार करना हो तो सरकार और पार्टी दोनों की नीति और नियत पर सवाल उठाए जाने लाजिमी है ।

भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रैली भी ऐसी वैसी नहीं हाईटेक डिजिटल चुनावी रैली । जिसका खर्चा भी सैकड़ों करोड़ रुपये हो । यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी ने ऐसी चुनावी रैली पहली बार नहीं की है । 2014 में ही आम चुनाव के समय भी कुछ इसी तरह से चुनाव प्रचार कर इसका श्रीगणेश किया जा चुका था । विश्व के विकसित देशों में इसी तरह की चुनावी रैलियां होती हैं । वर्चुअल रैलियां समय की मांग बनती जा रही हैं । हाँ ये जरूर है कि इस तरह की भारीभरकम खर्च और टेक्नोलॉजीयुक्त चुनावी रैली छोटे और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा भी हैं । एक बात और देशवासियों को भी इस तरह की हाईटेक चुनावी रैलियों में परोसे जाने वाले सच और झूठ को अलग करने की समझ नहीं है । अभी तो वह चकाचौंध में ही ऐसा चौन्धिया जाता है कि अपना बुद्धि विवेक दरकिनार कर थोक में वोट दे आता है भले ही उसका खामियाजा देश और खुद को भुगतना पड़े । चतुर चालाक नेता सिनेमाई चुनाव प्रचार में मदारी की तरह डमरू बजाते हुए जमा हुई भीड़ को हिप्नोटाइज करके गंजे को कंघी और अंधे को चश्मा बेच कर बदले में सत्ता की चाबी चुरा कर ले जाते हैं । फिर पछताये होत का जब चिड़ियां चुग गईं खेत ।

भारतीय जनता पार्टी का देश और राज्यों में सत्तारूढ़ होने का शुरू हुआ सफर "सपनों के सौदागर" से "लाशों के सौदागर" में तब्दील हो जायेगा इसकी कल्पना बहुतायत में नहीं की गई थी जबकि भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरे की बारीक समझ रखने वालों ने इसकी जानकारी देने में कोई कोर कसर नहीं रखी । मगर फिलहाल देश में पसरा राजनीतिक चुनौती भरा शून्य सन्नाटा शैतान को भी भगवान बनाये रखने के लिए पर्याप्त है । स्वाभाविक ही है कि जब मैदान में चुनौती देने वाला कोई न हो तो मरियल भी खुद को दारासिंह, किंगकांग का बाप समझता है ।

बिहार में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा गत दिवस सम्पन्न हुई डिजिटल रैली 72 हजार एलईडी स्कीन लगाकर की गई । जिस पर दो सौ करोड़ रुपये खर्च होने की चर्चा है । अभी तो शुरुआत हुई है आगे आगे देखिए होता है क्या । इस तरह की कई चुनावी रैली होंगी जिसे अमित शाह, नरेन्द्र मोदी, जय प्रकाश नड्डा संबोधित कर सकते हैं ।

भाजपा ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वह कुबेरों की पार्टी है । बहुत कर ली मुद्दों और सिद्धान्तों की राजनीति क्या मिला ? एक वोट से अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार धराशायी हो गई थी । बहुत चला ली जनसंघ - भाजपा विचारधारा से पार्टी । क्या मिला - सत्ता से मीलों दूर का फासला । जब भाजपा का कांग्रेसीकरण किया गया (नामचीन मवाली, गुण्डे, अपराधियों, चरित्रहीनों आदि का पार्टी प्रवेश) तभी न ताजोतख्त हासिल हुआ । इसलिए अब तो केवल दलबदलुओं के दम पर पैसों की राजनीति की जाएगी जिससे 2014, 2019 में देश की सत्ता मिली । अनेक राज्यों में अंगुली में गिने जाने वाले पार्टी विधायक होने के बावजूद कुर्सी हथियाई गई ।

सत्ता सिंघासन तक पहुंचने के लिए अवसर पैदा करने होते हैं फिर चाहे "सपनों की मंडी लगानी पड़े  या फिर लाशों की ! महत्वपूर्ण है लड़ाई जीतना । इतिहास तो विजेता अपने हिसाब से खुद लिखवा लेगा । जनता भी जीतने वाले की ही जय जयकार करती है भले ही जीत अन्याय, अत्याचार से मिली हो ।

देश के वर्तमान हालातों में भी चुनावी रैली का शंखनाद कर भारतीय जनता पार्टी और उसके हुक्मरानों ने बता दिया है कि उनके लिए सत्ता और सत्ता तक पहुंचने के लिए चुनाव से अधिक कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है । और इसी की खातिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में बढ़ रहे कोरोना संक्रमितों के बाद भी लॉक डाउन को अनलॉक में बदलकर जनता को साफ - साफ कह दिया है कि आप सभी को कोरोना के साथ ही जीना होगा इसकी आदत डाल लें । मतलब साफ है कि जनता जिये चाहे मरे हमें तो राजनीति करनी है । हमें चुनाव - चुनाव खेलना है ।

अमित शाह द्वारा की गई वर्चुअल चुनावी रैली पर देशवासियों की तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं । उनमें से हांडी के चावल की तरह कुछ पर नजरें इनायत की जा सकती है ।

इटली में जब 2 लाख 35 हजार के लगभग कोरोना मरीज हुए थे तो वहां के प्रधानमंत्री दुःख से रो दिए थे । भारत में ढ़ाई लाख से ज्यादा मरीज होने के बाद भी हमारा प्रधानमंत्री चुनाव की तैयारी में मस्त है ।

बेरोजगारी चरम पर है, अर्थव्यवस्था सबसे ज्यादा दयनीय हालत में है, मजदूर उसका परिवार एक वक्त के भोजन के लिए संघर्षरत है और देश का गृहमंत्री अपनी पार्टी के लिए 72 हजार एलईडी स्कीन लगाकर बिहार में चुनाव प्रचार अभियान की शुरूआत कर रहा है ।

इतिहास याद रखेगा कि जब कोरोना वायरस से देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह ढह गई थी तब भाजपा का चाणक्य चुनावी रैलियां कर रहा था । अमित शाह भारत की राजनीति के लिए एक अभिशिप्त अपमान है ।_

एक वर्चुअल रैली का खर्चा 180 करोड़ रुपये । मजदूरों को उनके घर तक पहुचाने के लिए पैसे नहीं । चुनाव के लिए पैसे कहां से आये ? प्रधानमंत्री राहत कोष के समानांतर बनाये गए पी एम केयर फंड की पारदर्शिता पर भी उंगली उठाया जाना शुरू हो गया है ।

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