यादों के फूलों से खुशबू चुराकर

मैंने बनाईं थी माला 

दुनिया के नज़रों से अब तक छुपाकर 

मैंने इसे यूं सम्हाला ।

जहां भी गया दोस्ती की सभी से 

 नहीं थी तो बस दुश्मनी 

लोगों से हरदम कहता फिरा मैं 

ऐसी कहानी बनी ।

 सवालों के घेरे में मुझको फंसाकर 

कहे सब ये क्या कर डाला  ? 

यादों के फूलों से - - - - - -

रिश्तों की डोरी से हर पल बंधे हैं 

ये उलझे ना एक पल भी यार 

जमाने में ऐसे भी, ख़ुदग़र्ज़ हैं जो 

न समझे हमारा प्यार ।

 फिर भी हमेशा , बड़ी शिद्दत से 

अपने वजूदों को पाला ।

यादों के फूलों से .....



 डॉ.मन्तोष भट्टाचार्य 

मदर टेरेसा नगर 

जबलपुर (म.प्र)

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