आलेख : मीडिया और राजनीति : तीन : 

कलयुग की कलम 

मीडिया पर गैर-सरकारी विज्ञापनों का प्रत्यक्ष दबाव कम रहता है लेकिन सरकारी विज्ञापन अपनी कीमत वसूलते हैं। सरकार की खिलाफ़त उन्हें मंहगी पड़ती है, विज्ञापन रोक दिए जाते हैं या भुगतान अटका दिया जाता है। 

इस सच्ची घटना पर गौर करें, बात तब की है जब वर्ष 2015 में कटनी जिले के बहोरीबंद विधानसभा सीट में उपचुनाव हो रहे थे ।जबलपुर के एक समाचार पत्र में मैं (शैलेश पाठक )ब्यूरो चीफ रहा और एक चुनावी खबर तत्कालीन प्रभारी मंत्री के खिलाफ प्रकाशित हुई।तब  एक गांव में सभा करने पहुंचे प्रभारी मंत्री जी ग्रामीणो का आक्रोश देखकर बिना सभा किए वापस लौट गए थे। इस खबर से प्रभारी मंत्री जी इतना नाराज हुए कि अखबार के संपादक जी ,जो मंत्री जी के पुराने मित्र हैं, फोन पर नाराजगी जताई ।बस इसके बाद क्या था, मुख्य संपादक जी का फोन जबलपुर जीएम को पहुंचा और जीएम कार लेकर कटनी को रवाना हुए। जीएम ने मुझे फोन पर प्रभारी मंत्री जी की लोकेशन लेकर मिलने को कहा ।प्रभारी मंत्री जी दोपहर करीब 2  बजे पिपरौंध  के आसपास थे ।और मे पीरबाबा पहुंचा। जीएम के साथ कार में बैठा ‌।इस बीच प्रभारी मंत्री जी कटनी को रवाना हो चुके थे। प्रभारी मंत्री जी एक होटल में रुके थे और हम लोग की मुलाकात फिर वही हुई ।जीएम ने मुझे पहले से अच्छी तरह समझा दिया था कि हर बात पर गलती अपनी ही मानना है ।विज्ञापन बंद हो जाएंगे ।मंत्री जी से होटल के कमरा नंबर 105 में मुलाकात के दौरान मैं चुपचाप बैठा रहा और जीएम और मंत्री जी की बातें सुनता रहा। दूसरे दिन अखबार में उसी खबर को मंत्री जी के पक्ष में लगाकर बात खत्म हो गई ‌।

पत्रकार समाचार प्रमाण के साथ तैयार करता है, पाठकों में अच्छी प्रतिक्रिया रहती है। लेकिन  व्यवसायिक मानसिकता मीडिया को यह सोचने पर मजबूर करती है कि किसी खबर से

"सरकार को कैसे फायदा होगा, यह सरकार की समस्या है, हमारी नहीं। पत्रकार को ऊपर से आदेश हो जाता है कि उस खबर को बंद करो, कल से नहीं आना चाहिए।"  नौकरी बचाने की विवशता में पत्रकार की खबर रोक दी जाती है और एक अच्छी खबर की भी  भ्रूणहत्या हो जाती है।

इस घटना से यह समझा जा सकता है कि पत्रकारिता अलग बात है और पत्रकारिता की नौकरी अलग है। 

शैलेश पाठक ,पत्रकार

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