फकीरों की टोली नागौद ही नहीं सारे देश के लिए एक नई मिशाल

कलयुग की कलम/योगेश योगी/ सतना

फकीर मतलब बिंदास, बिंदास यानी कि बेपरवाह और इतिहास गवाह यह है कि बिंदास लोगों ने ही कुछ नया किया है, क्योंकि जिम्म्मेदारियों से ग्रसित लाखों लोग इस कदर ज़िम्मेदारियों और अपने पन में व्यस्त हैं कि औरों की फिक्र कँहा। औरों से मेरा तात्पर्य उन लोगों या उस व्यवस्था से है, जो है तो बहुत जरूरी लेकिन उनको प्रदान करने की उस पर काम करने की ज़हमत कोई नहीं उठाता या उठाना नहीं चाहता।

*नागौद* शहर में ऐसे ही फकीरों ने उठते-बैठते, चलते-फिरते, एक से दो, दो से चार और फिर एक कारवाँ बना लिया और उसे फकीरों की टोली के नाम से जाना जाने लगा।

किसी एक व्यक्ति का नाम अगर मैं लूं तो यह अन्य जुड़े हुए लोगों की निष्ठा पर प्रश्न होगा इस टोली में जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति *दिल* से जुड़ा है न कि किसी *लालच* से।

फ़क़ीरों की इस टोली ने नागौद में वो मिशाल दी है जिसकी जितनी तरीफ की जाय वह कम है, सबसे पहले तो इस टोली ने शहर के उन हिस्सों जँहा लोगों का आना जाना रहता है तथा घण्टों रुकना बैठना रहता है को पूर्णतः साफ किया, वँहा की *गंदगी* जमे हुए झाड़, खरपतवार आदि को हटाकर ऐसा साफ स्वच्छ किया कि लोग कार्य को स्वच्छता की मिशाल समझने लगे।

फकीरों की टोली यहीं नहीं रुकी इस *कोविड-19* की वैश्विक महामारी में जब समूचा देश लड़ रहा था तब मजदूरों, कामगारों की घर वापसी लगातार हो रही थी, लोग शहरों से अपने घर पैदल ही चले, फकीरों की टोली ने  लगातार *52 दिन* तक इनके भोजन, पानी, दवाई, मास्क, सेनेटाइजर आदि की लगातार व्यवस्था करके *मानवता* की मिशाल पेश की। 

अमीर तो कई हैं अहले वतन में।

दिल से अमीर होना सबके बस में नहीं।।

फकीरों की टोली में बेशक *फ़कीराना* व्यक्तित्व के लोग जुड़े हैं लेकिन उनके ह्रदय की गहराई उन *अमीराना* लोगों से लाखों गुना गहरे हैं। जिनके पास धन, दौलत, यश, वैभव तो सब कुछ है लेकिन दिन संकुचित है। जिनकी धड़कने सिर्फ पैसों और अपनों तक ही सीमित हैं। 

फकीरों की टोली ने कुछ ही महीनों में न सिर्फ कार्य किया बल्कि लोगों के दिलों में एक *गहरी छाप* छोड़ी है जो अमिट है। फकीरों की टोली ने जनहित के कार्यों को न सिर्फ किया है बल्कि समाज और देश को ये संदेश दिया है कि मन में अगर करने की चाह हो तो रास्ता आपने आप बन जाता है और नेकदिली का यह रास्ता *सर्वजन_हिताय_सर्वजन_सुखाय* से होता हुआ सीधे दिलों से जुड़ता है।

मुझे याद है इस बीस साल में कइयों बार नागौद के *शव_विच्छेदन_गृह* तक जाना हुआ वँहा की व्यवस्था आसपास फैली कंटीली झाड़ियाँ कहीं कोई आसरा नहीं परिजनों को बैठने की ठाँव तक नहीं ठंडी हो बारिश हो या गर्मी, देह के इंतज़ार में लोग घण्टों सड़क के किनारे बैठे रहते, खड़े रहते बदहवास से लोग उनमे मैं भी शामिल रहता। 

अभी कुछ दिनों पहले मेरा फिर जाना हुआ जँहा पहुँचते ही एकाएक मैं अचंभित हो गया, चारों तरफ सफाई कटीली झाड़ियों का नामोनिशान तक नहीं, स्वच्छ वातावरण, आसपास सीमेंटेड मोल्डेड फर्श, और परिजनों जे बैठने के लिए *"फ़कीर_छाया"* यकीन मानिए यह दुख की घड़ी में परिजनों को थोड़ा सुकून देने वाला है, वँहा बैठकर मेरे ही नहीं कई लोगों के दिलों से फकीरों की टोली के लिए दुवाओं का अंबार प्रस्फुटित हो गया। मैं दावे से कह सकता हूँ ये दुवाएँ आप दुनिया की किसी दौलत से नहीं खरीद सकते जो फकीरों की टोली ने अपने जज्बों से पाई है।



Share To:

Post A Comment: