लोकतंत्र बन गया नोंक झोंक तंत्र 

कलयुग की कलम 

भारतीय लोकतंत्र में जिस तरह से जनता शासन प्रशासन के प्रति मुखर हो रही है यह देश के लोकतांत्रिक ढाचे के लिए कोई शुभ संकेत नहीं लग रहा है

देश के अन्दर जिस तरह से आम जनता की आवाज शासन प्रशासन के प्रति खुलकर आने लगी है जगह जगह प्रशासनिक अधिकारी और नेताओं से आम जनता के साथ नोंक झोंक होना यह अनुशासन की महान कमी का संकेत है क्योंकि लोकतंत्र में अनुशासन ही प्रधान है राजतंत्र में शासन प्रधान था 1947 में भारत को आजादी मिली और बाद में देश की जनता को लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हुआ धीरे धीरे समय गुजरता गया जिन लोगों ने 1947 से पहले शासन में जीना सीखा था वो लोकतंत्र का अधिकार प्राप्त होने पर भी शासन की गुलामी के आदती थे और जो उस समय जागरूक थे उन्हों ने सत्ता सम्हाल लिए लेकिन जनता पर अनुशासन के बदले राजतंत्र की तरह शासन करने लगे शासन को स्वीकार करने वाले धीरे धीरे चले गये और देश की आगे आने वाली पीढ़िया पढ़ लिखकर अपने प्राप्त अधिकारों के बारे में जागरूक होने लगी और अपने अधिकारों को माँगने लगी जिसे प्राप्त करने के लिए आन्दोलन व संघर्ष होने लगे लेकिन जिन लोगों ने संघर्ष समाज के नाम पर किया जनसहयोग प्राप्त किया वो नेता बन गए और सत्ता में बैठ गए या सांसद विधायक बनकर विपक्ष में बैठे वही काम करने लगे जो शासन की परंपरा रही और इन शासकों की नाकामी से प्रशासन भी शासक बन बैठा और जनता में झूठा भय पैदा किया जाने लगा जिससे आम जनता इनके भ्रष्टाचार पर अँगुली न उठा सके यदि उठाना चाहती थी तो सबूतों के अभाव में चुप हो जाना होता रहा लेकिन जब से यह आधुनिक दौर बढ़ा और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ा लोगों के हाथों में मोबाइल फोन और कैमरा आया तो आम नागरिक भी मीडिया का कार्य करने लगा जिससे तमाम शासक प्रशासक के गंदे कारनामें सामने आने लगे हैं और जनता इन्हें देखने की नजरिया बदलने लगी है जिससे आम जनता बड़े नेता अधिकारी से भी नोंक झोंक और सवाल करने लगी है सवालों का उत्तर न पाने पर बवाल करने लगी है देश के अन्दर जिस तरह से आम जनता की आवाज शासन प्रशासन के प्रति खुलकर आने लगी है जगह जगह प्रशासनिक अधिकारी और नेताओं से आम जनता के साथ नोंक झोंक होना यह अनुशासन की महान कमी का संकेत है क्योंकि लोकतंत्र में अनुशासन ही प्रधान है राजतंत्र में शासन प्रधान था 1947 में भारत को आजादी मिली और बाद में देश की जनता को लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हुआ धीरे धीरे समय गुजरता गया जिन लोगों ने 1947 से पहले शासन में जीना सीखा था वो लोकतंत्र का अधिकार प्राप्त होने पर भी शासन की गुलामी के आदती थे और जो उस समय जागरूक थे उन्हों ने सत्ता सम्हाल लिए लेकिन जनता पर अनुशासन के बदले राजतंत्र की तरह शासन करने लगे शासन को स्वीकार करने वाले धीरे धीरे चले गये और देश की आगे आने वाली पीढ़िया पढ़ लिखकर अपने प्राप्त अधिकारों के बारे में जागरूक होने लगी और अपने अधिकारों को माँगने लगी जिसे प्राप्त करने के लिए आन्दोलन व संघर्ष होने लगे लेकिन जिन लोगों ने संघर्ष समाज के नाम पर किया जनसहयोग प्राप्त किया वो नेता बन गए और सत्ता में बैठ गए या सांसद विधायक बनकर विपक्ष में बैठे वही काम करने लगे जो शासन की परंपरा रही और इन शासकों की नाकामी से प्रशासन भी शासक बन बैठा और जनता में झूठा भय पैदा किया जाने लगा जिससे आम जनता इनके भ्रष्टाचार पर अँगुली न उठा सके यदि उठाना चाहती थी तो सबूतों के अभाव में चुप हो जाना होता रहा लेकिन जब से यह आधुनिक दौर बढ़ा और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ा लोगों के हाथों में मोबाइल फोन और कैमरा आया तो आम नागरिक भी मीडिया का कार्य करने लगा जिससे तमाम शासक प्रशासक के गंदे कारनामें सामने आने लगे हैं और जनता इन्हें देखने की नजरिया बदलने लगी है जिससे आम जनता बड़े नेता अधिकारी से भी नोंक झोंक और सवाल करने लगी है सवालों का उत्तर न पाने पर बवाल करने लगी है

यहाँ शासक और प्रशासक को अपनी कार्यप्रणाली में परिवर्तन और समाज के साथ सामंजस्यपूर्ण व्यवहार स्थापित करना होगा

                सुनीलमिश्रा केशवदास

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